क्या पाली भाषा संस्कृत की जननी है ?
लोकप्रचारित मान्यता है कि संस्कृत सभी भारतीय भाषाओं की जननी है। यदि संस्कृत जननी है तो पालि भाषा जननी की जननी है, संस्कृत की माँ है।
विगत माह पालि रिसर्च इंस्टीट्यूट, मुम्बई में सम्मिलित होने का अवसर मिला। युवा मित्र श्री अरविन्द भण्डारे के नेतृत्व में पालि भाषा के प्रचार-प्रसार व उत्थान के लिए यह संस्था बहुत सक्रियता से काम कर रही है।
श्री अरविन्द भण्डारे, श्री विशाल मोरे, श्रीमती रोहिणी भण्डारे तथा पालि रिसर्च इंस्टीट्यूट, मुम्बई के सभी आयोजकगण विशेष बधाई के पात्र हैं जो भारत भूमि में उस भाषा को पुनर्जीवित करने का प्रयास कर रहे हैं जिसमें भगवान बुद्ध संवाद करते हैं।
यह अभिनव व्याख्यान माला मेरे अपने लिए एक महान उपलब्धि रही कि स्वनामधन्य महानुभाव डा बालचन्द्र खाण्डेकर, पूज्य एम मेधंकर थेरो, महाबोधि सोसाइटी, भारत, भदन्त एन. आनन्द नायक महाथेरो, डा सरोज चौधरी, रा. तु. मा. विद्यापीठ, नागपुर, प्रा. पबज्जो रवि, धारवाड़, कर्नाटक, प्रा. देवेन्द्र उबाले, प्रा. गौतम मोरे, सोमय्या कालेज, श्री जगन्नाथ जी काले, पूज्य भदन्त डा. राहुल बोधि आदि व्यक्तित्वों से मुलाकात हुई, उन्हें देखने-सुनने का अवसर मिला।
श्री आ. ह. सालुंखे, डा. प्रफुल्ल गाडपाल जी की अनुपस्थिति का मन में अफसोस भी रहा।
कई बरसों से मित्र श्री अरविन्द भण्डारे का आग्रह था कि मैं उन्हें अपनी पुस्तकें मराठी अनुवादित करने की अनुमति दूं। इस व्याख्यान माला के अवसर पर पालि रिसर्च इंस्टीट्यूट, मुम्बई को मैंने अपनी तीन पुस्तकों को न केवल अनुवाद करने की अनुमति दी वरन उसकी रॉयल्टी इसी संस्थान को दान करने की भी घोषणा की।
यह वह व्याख्यान है जो तैयार करके गया था, लेकिन समयाभाव के कारण इसे संक्षेप में ही प्रस्तुत कर सका। कारण यह कि मेरा व्याख्यान अपराह्न सत्र में था और मुझे वापसी की उड़ान पकड़ने की भी जल्दी थी।
इसके बावजूद आवाज़ इण्डिया टीवी चैनल ने एडिट करने के बाद भी लगभग 14 मिनट का व्याख्यान आच्छादित यानी कवरेज़ किया है और सीधा प्रसारण भी किया था। पालि रिसर्च इंस्टीट्यूट के आयोजकों को कोटिशः बधाइयाँ और आभार।)
पालि वह भाषा है जिसमें भगवान बुद्ध संवाद करते थे। आज यह भाषा विश्व भाषा बनने की ओर अग्रसर है।
भाषायी तकनीकी दृष्टि से भगवान के काल में आम लोगों के द्वारा बोली जाने वाली भाषा का नाम मागधी अथवा अर्धमागधी था। इसके इस नामकरण के पीछे कारण यह था कि यह भाषा मगध के आसपास प्रचलन में थी और भगवान बुद्ध की चारिका परिधि में अधिकांश मगध समावेशित होता था।
मागधी को पालि के नाम से विख्यात करने में सबसे बड़ी भूमिका प्रथम शताब्दी ईसा पूर्व में आचार्य अश्वघोष की रही। उन्होंने बड़ी प्यारी परिभाषा दी- जो भाषा भगवान की वाणी को पाल रही है वह पालि है- पालयति इति पालि। यह भावपूर्ण उपमा आमजन से विद्वद्जनों तक के हृदय को छू गयी और भगवान की वाणी का नाम पालि हो गया।
इस भाषा के क्रमिक इतिहास को संक्षेप में तीन अंगों में देखा जा सकता है:
1. प्राचीन काल2. मध्य काल3. आधुनिक काल
1. प्राचीन काल
पालि भाषा के प्राचीन युग को देखने के लिए संगीतियों को थोड़ा क्रम से देखना होगा।
प्रथम संगीति
महाकाश्यप के आह्वान पर भगवान के परिनिर्वाण के तीन माह उपरांत पहली संगीति का आयोजन राजगृह(राजगीर) की सप्तपर्णी गुफ़ा में हुआ जिसमें पांच सौ अरहत एकत्रित हुए।
संगीति में पहला ही प्रश्न खड़ा हो गया कि भगवान के वचनों को संरक्षित करने की शुरुआत कहाँ से की जाए क्योंकि उस संगीति में सम्मिलित हर व्यक्ति भगवान को व्यक्तिगत रूप से जानता था, हर किसी के पास भगवान से जुड़ा अपना प्रसंग, अपना संस्मरण था।
हर व्यक्ति अपना अनुभव बताने को तत्पर था। तब महाकाश्यप को भगवान के वचनों ने ही मार्ग सुझाया- विनयानामबुद्धसासनस्सआयु- विनय ही बुद्ध शासन की आयु है अर्थात जब तक विनय रहेगा तब तक बुद्ध शासन रहेगा।
तय हुआ कि सर्वप्रथम विनय का संगायन होगा। इस प्रकार सर्वप्रथम विनयपिटक का संगायन हुआ। अरहत उपालि ने विनय का संगायन एवं सत्यापन किया। फिर सुत्त पिटक का संगायन अरहत आनन्द के द्वारा हुआ।
प्रथम संगीति में अभिधम्म का प्रथक अस्तित्व नहीं आया था। अभिधम्म सुत्त में ही अन्तर्निहित था।
यह संगीति सात माह चली। सम्राट अजातशत्रु ने इस संगीति का पोषण किया।
संगीति की इस दिव्य घटना ने पालि भाषा को पहली बार आमजन की भाषा से शास्त्रीय स्तर, क्लासिक लेवल, पर स्थापित किया। अब यह भाषा पूजनीय, वन्दनीय, स्तुतिनीय हो गयी।
दूसरी संगीति
पहली संगीति के सौ साल के बाद दूसरी संगीति का आयोजन हुआ, ई. पू.444 में, वैशाली में, सम्राट कालाशोक के शासनकाल में, बालुकाराम विहार में। इसकी अध्यक्षता अरहत सब्बकामी ने की जिनकी आयु उस समय 120 साल थी और उपाध्यक्ष आचार्य रेवत थे।
अरहत सब्बकामी ने पहली संगीति में धम्मसेवा की थी। अरहत आचार्य रेवत भी इस संगीति के वरिष्ठ प्रतिनिधि थे।
यह संगीति एक तरह से सिर्फ विनय संगीति थी क्योंकि वैशाली के वज्जिपुत्तक संघ द्वारा विनय की मनमानी व्याख्या करके धन-सम्पत्ति इकट्ठा की जाने लगी थी, उपासकों की श्रद्धा का शोषण किया जाने लगा था।
तब काकण्डपुत्त यश के प्रयत्नों से वरिष्ठ धम्मज्ञ अरहतों की परिषद आमंत्रित की गयी और विनय को पुनर्स्थापित किया गया। इस संगीति में सात सौ भिक्खु सम्मिलित हुए इसलिए इसे सप्तशतिका संगीति भी कहते हैं।
संंगीति में होता क्या है? भगवान के वचनों की एक-एक पंक्ति को पूरी परिषद के द्वारा संगायन किया जाता है। काल की लम्बी अवधि में यदि अर्थ, व्यंजन, उच्चारण में कोई दोष आ गया है तो उसे संशोधित किया जाता है। संशोधन को वरिष्ठ अरहत के द्वारा सत्यापित किया जाता है, संघ का अनुमोदन प्राप्त किया जाता है।
दूसरी संगीति तक आते-आते पालि देव वाणी जैसी हो गयी। इसके जानकार विशिष्ट आदर के साथ देखे जाने लगे।
तीसरी संगीति
संगीति के इतिहास में तीसरी संगीति स्वर्णिम घटना है। इसने पालि भाषा के वैश्विक विस्तार निर्णायक भूमिका अदा की।
ई. पू.326 में पाटलिपुत्र में आयोजित इस संगीति का पोषण महान सम्राट अशोक के द्वारा किया गया। इसकी अध्यक्षता सम्राट अशोक के गुरू अरहत मोगलिपुत्त तिस्स के द्वारा की गयी। यह संगीति नौ माह तक चली।
इसमें एक हजार भिक्खुओं ने प्रतिभाग किया। भगवान के महापरिनिर्वाण को लगभग सवा दो सौ साल बीत चुके थे। बुद्ध धम्म के नाम पर अनेक मिथ्या मतों का उदय हो गया था। यश-कीर्ति-धन के लोभ में अनेक दुःशील लोग संघ में प्रविष्ट हो गये थे, वे संघ को अन्दर से दूषित कर रहे थे।
संगीति अध्यक्ष मोगलिपुत्त तिस्स ने मिथ्या मतों का खण्डन करते हुए ‘कथावत्थु’ नामक ग्रन्थ का संकलन किया और इसी संगीति में अभिधम्म पिटक स्वतंत्र अस्तित्व में आया।
संगीति के समापन पर सम्राट अशोक द्वारा अरहत भिक्खुओं के नेतृत्व में नौ परिषदें पूरी दुनिया में बुद्धवाणी के प्रचार के लिए रवाना की गयीं तथा श्रीलंका को स्वयं अपने पुत्र-पुत्री अरहत महेन्द्र और थेरि संघमित्रा को भेजा। इस संगीति के बाद बुद्ध धम्म सम्पूर्ण दक्षिण पूर्व एशिया में फैल गया। एक तरह से भारत की विश्व पर यह धम्म विजय थी।
इसी के साथ पालि भाषा का भी वैश्वीकरण हो गया। यदि वैश्वीकरण न कहें तो कम से कम एशियाकरण तो हो ही गया। पूरे एशिया में यह भाषा शास्त्रीय भाषा, क्लासिक लैन्ग्वेज, के रूप में स्थापित हो गयी।
आज थाईलैंड, बर्मा, श्रीलंका, वियतनाम, कम्बोडिया, मलेशिया, तिब्बत, चीन की भाषा में भी हजारों ऐसे शब्द समावेशित हो गये हैं जिसकी जड़ में पालि का कोई शब्द होता है।
सिर्फ एक उदाहरण देखिये।
भगवान ने “ज्झान” शब्द का प्रयोग किया है।पालि भाषा का यही शब्द संस्कृत में “ध्यान” हो गया। बुद्ध धम्म जब चीन पहुँचा तो यही शब्द “चाॅन” उच्चारित किया जाने लगा।
चीन से तिब्बत तक पहुँचते हुए यही शब्द “घाॅन” कहा जाने लगा।तिब्बत से कोरिया तक की भाषायी यात्रा में यही शब्द “साॅन” या “साॅनजान” उच्चारित होने लगा।कोरिया से वियतनाम पहुँचने पर यही शब्द “थियेन” उच्चारित किया जाने लगा।और जापान तक पहुँचते हुए यही शब्द “ज़ेन” हो गया।आज कोई समझ भी नहीं सकता कि “ज़ेन” शब्द की जड़ में पालि भाषा का शब्द “ज्झान” है। एशिया के देशों की भाषा में पालि भाषा के ऐसे हजारों शब्द समावेशित हैं जिनपर भाषा विज्ञानियों ने अनेक शोधग्रंथ लिखे हैं।
चौथी संगीति
इतिहास में चौथी संगीति के रूप में दो संगीतियां दर्ज़ हैं। एक ई. पू. 29 में सम्राट वट्टगामिनी के काल में श्रीलंका में और दूसरी सम्राट कनिष्क के काल में ईस्वी 80 में कश्मीर के कुण्डलवन में भारत में। यद्यपि कि श्रीलंका की संगीति की अधिक मान्यता है क्योंकि इसमें थेरवादी भिक्खुओं ने हिस्सा लिया।
सम्राट अशोक ने बुद्ध वाणी का सारी दुनिया में प्रसार कर बड़ा दूरदर्शी कदम उठाया कि यदि कभी भारत में यह परम्परा बाधित भी हो तो शेष दुनिया में बुद्ध वाणी बची रहे। और सच में कालान्तर में ऐसा ही हुआ भी। भारत से यह परम्परा लुप्त जैसी हो गयी लेकिन बौद्ध देशों में बुद्ध वचन अपने मौलिक रूप में आज भी यथावत जीवन्त हैं।
श्रीलंका की चौथी संगीति में त्रिपिटक के मौखिक संगायन के साथ एक अनूठा काम और हुआ कि त्रिपिटक को भोजपत्रों पर लिपिबद्ध किया गया ताकि बुद्ध वाणी हमेशा के लिए अपने विशुद्ध रूप में संरक्षित रह सके।
सम्राट वट्टगामिनी के काल में ई. पू. 29 में श्रीलंका में आयोजित चौथी संगीति में पांच सौ विद्वान थेरों ने प्रतिभाग किया जिसकी अध्यक्षता महाथेर रक्खित ने की। संगायन के उपरान्त सम्पूर्ण त्रिपिटक को लिपिबद्ध करके बुद्ध वचनों को हमेशा के लिए शुद्ध स्वरूप प्रदान किया गया। इस प्रकार पालि के शास्त्रीय साहित्य, क्लासिकल लिटरेचर, का जन्म हुआ।
2. मध्यकाल
पांचवी संगीति
सम्राट अशोक की दूरदर्शिता काम आयी। बारहवीं शताब्दी के बाद से भारत से बुद्ध धम्म लुप्त-सा होने लगा लेकिन शेष बौद्ध देशों में यह अपनी सम्पूर्ण प्रभा के साथ दमकता-चमकता रहा।
सम्पूर्ण बौद्ध इतिहास का अवलोकन करें तो पाते हैं कि बुद्ध का धम्म नष्ट कभी नहीं हुआ। यदि आलंकारिक रूप से कहें तो बुद्ध धम्म सूर्य है।
जब वह एक स्थान पर अस्त होता दिखता है तब ठीक उसी समय धरती के किसी दूसरे भूभाग में उसका उदय हो रहा होता है।
जब भारत से बुद्ध सूर्य अस्त होता दिख रहा था ठीक उसी समय श्रीलंका, नेपाल, बर्मा, कम्बोडिया, लाओस आदि देशों में यह अपनी पूरी प्रभा के साथ चमक रहा था।
इन देशों में भारत के प्रति आभार और आदर का भाव है। बौद्ध देशों के श्रद्धालुजन भारत की ओर पैर करके सोते नहीं हैं, सुबह उठ कर भारत की ओर मुख करके हाथ जोड़कर वन्दना करते हैं।
संगीति की परम्परा भारत से लुप्त-सी हो गयी लेकिन अपने गुरू देश के प्रति आभार भावना से भरे बौद्ध देशों ने इस परम्परा को पूरी शुद्धता के साथ यथावत जीवित रखा।
19वीं शताब्दी तक भारत सहित लगभग पूरा एशिया ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन हो चुका था। ब्रिटिश साम्राज्यवाद के कारण भी एशिया के देशों की सांस्कृतिक धाराओं में अवरोध उत्पन्न हुए।
ऐसे समय में बर्मा ने अपना आध्यात्मिक दायित्व निभाया और पांचवी संगीति आयोजित करने का संकल्प लिया। इस संकल्प की पूर्ति में संरक्षण का पुण्य लाभ बर्मा के सम्राट मिं डों मिं को मिला। भगवान की वाणी को अक्षुण्ण रखने में जिन शासकों ने संरक्षण प्रदान किया वे इतिहास में अमर हो गये।
सन् 1871 में ब्रम्हदेश अर्थात बर्मा में सम्राट मिं डों मिं के काल में पांचवी संगीति का आयोजन हुआ, मांडले शहर में। इस संगीति में दो हजार चार सौ भिक्खुओं ने प्रतिभाग किया जिसकी अध्यक्षता क्रम से पूज्य महाथेर जागराभिवंस, पूज्य महाथेर नरिंदभिधज तथा पूज्य महाथेर सुमंगल सामी द्वारा की गयी।
संगीति के विवरणों को सदियों से बाकायदा लिपिबद्ध करके संरक्षित किया गया है ताकि प्रमाण व प्रेरणा अगली पीढ़ियों को सौंपा जा सके।
पांचवी संगीति में सम्राट मिं डों मिं ने सबसे बड़ा पुण्यार्जन यह किया कि उन्होंने समस्त बुद्ध सुत्तों को, सम्पूर्ण त्रिपिटक को, संगमरमर की पट्टिकाओं पर उकेरवा दिया और पूज्य संघ के द्वारा संगायन करते हुए उन पावन शिलाओं का लोकार्पण किया गया।
शिला पट्टिकाओं पर अंकित हो जाने से बुद्ध वचनों को परिशुद्ध अवस्था में संरक्षित रखने का महान कार्य हुआ। आज त्रिपिटक का सर्वाधिक प्रमाणिक संस्करण श्रीलंका एवं बर्मा का ही माना जाता है। बुद्ध वचनों के रूप में इस प्रकार पालि भाषा पत्थर की लकीर बन के अमिट हो गयी।
छठी संगीति
एक बात रेखांकित किये जाने लायक है कि संगीति जब भी होती है तो अध्यक्षता किसी मान्य अरहत के द्वारा ही होती है। पुण्यशाली है वह काल जब संगीति होती है और पुण्यवान हैं वो लोग जो इस महान घटना के साक्षी व सहभागी बनते हैं, अरहत के दर्शन करते हैं।
श्रोतापन्न, सकृतगामी, अनागामी, अरहत अवस्था प्राप्त एवं मार्गगामियों की सेवा करने व उन्हें दान का पावन अवसर मिलता है। संगीति आयोजन एक आध्यात्मिक घटना है।
इतिहास में छठी संगीति के आयोजन का श्रेय भी ब्रम्हदेश अर्थात बर्मा को जाता है। छठी संगीति कई मायनों में अनूठी है।
पूर्व की पांच संगीतियां राजकीय संरक्षण में हुईं अर्थात उनका पोषण राजाओं द्वारा किया गया। छठी संगीति पहली बार एक लोकतांत्रिक सरकार के संरक्षण में हुई जिसके प्रधानमंत्री ऊ नू थे।
सन् 1954 में शुरू हुई संगीति दो साल के उपरान्त सन् 1956 में मई माह में बुद्ध पूर्णिमा के दिन सम्पन्न हुई। उस समय तक भी बर्मा ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन ही था इस कारण पहली बार पश्चिमी देशों के लोग भी इस महान घटना के साक्षी बने।
इसमें बर्मा के अतिरिक्त श्रीलंका, थाईलैंड, कंपूचिया, भारत के भिक्खुगण मिलाकर दो हजार पांच सौ मान्य भिक्खु सम्मिलित हुए जिसकी अध्यक्षता श्रद्धेय अभिधज महारट्ठगुरू भदन्त रेवत ने की।
इस संगीति में सम्पूर्ण त्रिपिटक, इसकी अट्ठकथाओं, टीकाओं आदि को मान्य आचार्यों द्वारा पुनः जांचा-परखा गया।
कदाचित बुद्ध धम्म दुनिया की अकेली धार्मिक परम्परा है जो स्वयं को आधुनिकता के साथ अद्यतन, अपडेट, करती है, इसी कारण यह कभी कालवाहि अर्थात आउटडेट नहीं होती।
संगीति में मात्र बुद्ध वचनों की शुद्धता भर ही जांची-परखी नहीं जाती बल्कि बुद्ध धम्म के नाम पर नवसृजित साहित्य की भी विवेचना होती है।
बुद्ध वचनों से उनका मिलान किया जाता है, जहाँ साम्य होता उस पर मुहर लगाते हैं, उसका अनुमोदन करते हैं और जहाँ विसंगति होती है उसे निरस्त करते हैं। यह सारा साहित्य अभिधम्म का अंग बनता है। विनय और सुत्त यथावत रहते हैं।
छठी संगीति में, जो कि दो साल तक चली, बर्मा की मूल लिपि म्रंम लिपि में सम्पूर्ण त्रिपिटक को मुद्रित कराया गया। यह संगीति बर्मा की धरोहर हो गयी। इस रूप में पालि भाषा एशिया की सभी बोली-भाषाओं में समा गयी।
छठी संगीति इस मायने में भी अनूठी थी कि इसके उद्घाटन और समापन दोनों सत्रों में भारत के संविधान शिल्पी डा. बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर सम्मिलित हुए।
यहीं पर पूज्य संघ द्वारा बाबा साहेब को दूसरी बार ‘बोधिसत्व’ कह कर सम्बोधित किया गया। इसके पूर्व श्रीलंका में ‘विश्व बौद्ध भ्रातृत्व सम्मेलन’ में भी पूज्य संघ द्वारा बाबा साहेब को ‘लिविंग बोधिसत्व’ कह कर सम्बोधित किया गया था।
तीसरी बार 2 दिसम्बर’1956 को अशोका मिशन बुद्ध विहार, दिल्ली में परम पावन दलाई लामा के द्वारा बाबा साहेब को ‘बोधिसत्व’ सम्बोधित किया गया था।
बोधिसत्व बाबा साहेब ने बर्मा में प्रचलित एक लोकश्रुति सुनी कि भगवान बुद्ध के परिनिर्वाण के 2500 वर्षों के उपरान्त एक उपासक के द्वारा भारत से धम्म का पुनरोदय होगा।
इस लोकश्रुति से प्रेरित व उत्साहित हो कर 12 दिसम्बर’1954 को वर्ल्ड इंस्टीट्यूट ऑफ बुद्धिस्ट कल्चर के डायरेक्टर डा. आर एल सोनी के कार्यालय में आल्हादित कण्ठ से उन्होंने घोषणा की- भगवान बुद्ध की 2500वीं जयंती सन् 1956 में पड़ रही है। मैंने धम्म दीक्षा का पक्का निश्चय किया है!
वही संकल्प 14 अक्टूबर’1956 को नागपुर की महान धम्म दीक्षा के द्वारा फलीभूत हुआ।
नागपुर की महान धम्म दीक्षा के उपरान्त पुनः नवम्बर’1956 को श्रीलंका में बोधिसत्व बाबा साहेब ने घोषणा की- यदि दस साल और जीवित रह गया तो भारत को बुद्धमय बना दूँगा! लेकिन समय की विडंबना कि धम्म दीक्षा के दो माह भी बीतने नहीं पाए और बाबा साहेब 6 दिसम्बर’1956 को शान्त हो गये।
जिस संकल्प के लिये वे दस साल का समय चाहते थे उसके लिये जिन्दगी ने उन्हें 2 महीने का भी समय नहीं दिया।
3. आधुनक काल
सन् 1864 में श्रीलंका में घटित एक घटना ने पालि भाषा को भारतीय उपमहाद्वीप की भाषा से वैश्विक भाषा बना दिया।
सन् 1864 में ब्रिटिश उपनिवेश श्रीलंका में न्यायधीश नियुक्त हुए थोमस विलियम राइस डेविस। उनके न्यायालय में एक बार एक बुद्ध विहार के भूमि विवाद का प्रकरण आया। प्रकरण के सम्बन्ध में जो अभिलेखीय साक्ष्य प्रस्तुत किये गये उन्हें न्यायालय में कोई पढ़ना ही नहीं जानता था।
यह भी पढ़े – चौदह प्रकार के दान-माता प्रजापति गौतमी और बुद्ध का किस्सा !
न्यायधीश थोमस विलियम राइस डेविस को मालूम हुआ कि इस भाषा को एक वयोवृद्ध बौद्ध भिक्खु यात्रामुल्ले उन्नानसे पढ़ना जानते हैं। वह उनके पास गये। उस अभिलेख के स्रोत व उसके अर्थ को सुन कर वे अभिभूत हो कर रह गये।
दरअसल वह अभिलेख विनयपिटक का एक पन्ना था जिसमें विवादनिवारण के विषय में विनय सम्बन्धित भगवान बुद्ध के वचन थे। इनसाइक्लोपीडिया ऑफ बुद्धिज्म में आइ. बी. होरनर की प्रविष्टि है: “…जो दस्तावेज राइस डेविस के सामने प्रस्तुत किये गये थे वे ‘विनयपिटक’ में से कोई अमूल्य वचन थे।
उनका अर्थ सुन कर राइस डेविस के हृदय में उस अविदित भाषा को सीखने का प्रबल विचार उत्पन्न हो गया था।”
उन वचनों को पढ़ कर न्यायधीश महोदय में उस भाषा को सीखने की जिज्ञासा जाग पड़ी। अंततः पूज्य भन्ते जी से ही उन्होंने वह भाषा सीखी भी, पूरे विनय से सीखी और सन् 1881 में उन्होंने पालि टेक्स्ट सोसाइटी की स्थापना की।
बस यहीं से भारतीय उपमहाद्वीप की भाषा पालि के वैश्विक भाषा बनने की यात्रा शुरू होती है। पालि टेक्स्ट सोसाइटी की स्थापना के बाद सम्पूर्ण त्रिपिटक अंग्रेजी में अनुवादित हो गया।
और विगत 15 वर्षों से, बाबा साहेब के परिनिर्वाण दिवस की पचासवें वर्ष से, बोधगया में आयोजित हो रहे दस दिवसीय अन्तरराष्ट्रीय त्रिपिटक संगायन के आयोजन ने इस भाषा को सार्वभौमिक विस्तार दिया है। विश्व भर के लोग रोमन लिपि में त्रिपिटक का संगायन करते हैं।
इस भाषा को लेकर वैश्विक स्तर पर कितना दीवानापन है, आपको एक घटना बताता हूँ। सन् 2012 में धम्मपद का हमारा ऑडियो संस्करण आया। मेरे एक मित्र ने उसे गूगल पर अपलोड कर दिया।
उसे ताइवान में किसी ने सुना, महाशय कुआन ने। उसने ईमेल के जरिये मुझसे सम्पर्क किया और बताया कि वह ताइवान में पालि भाषा का छात्र है, धम्मपद के संगायन के ऑडियो संस्करण से उसे पालि भाषा के उच्चारण में मदद मिल रही है। उसके निवेदन पर मैंने उसे सीडी भेज दी।
लोकप्रचारित मान्यता है कि संस्कृत सभी भारतीय भाषाओं की जननी है। यदि संस्कृत जननी है तो पालि भाषा जननी की जननी है, संस्कृत की माँ है। संस्कृत भाषा का नाम ही इसकी उत्पत्ति की ओर इशारा कर रहा है।
“संस्कृत” मायने होता है- संस्कारित किया हुआ, रिफाइन्ड। पालि व प्राकृत को कथित रूप से संस्कारित करके, रिफाइन्ड करके, जिस नयी भाषा को जन्म दिया गया उसी का नाम संस्कृत है। इस विषय पर विस्तार से फिर कभी बोलेंगे।
आने वाले समय में पालि भाषा वैश्विक शास्त्रीय भाषा, क्लासिकल लैंग्वेज के रूप में उभरेगी।
राजेश चंद्रा जी की फेसबुक वाल से
