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हिंदी साहित्य

हे मालिक सुन लीजो, अगले जनम मोहे बिटिया ना कीजो

हे मालिक सुन लीजो,

अगले जनम मोहे बिटिया ना कीजो ।

पत्ता, कीड़ा बनाय के,

भले जमीन पर फेंक दीजो।

मालिक! अबकी मोहे बिटिया न कीजो।

इज्जत नाही बिटिया की,

तोरी सागर सी दुनिया मां

अरे ! आसमान में जायके बड़ी हूं

देख दुनिया की सोच आज भू में पड़ी हूं।

अरे ! तुझे बनाना है; तो रेगिस्तान का ऊंट बनाय लीजो,

पर अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो।

सबै हम पे अपना हक जतावे,

पूछे ना कोई, बेटी जीवन मां का करना चाहवे।

हे मालिक ! मेरी आत्मा भटके दीजो,

चाहे कीजो तो इतना कीजो;

अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो।

सगरी किस्मत लिख दियो तू जाने किसके नाम ?

माहरे हक में कभी न आयो सुख ,शांति ,विश्राम।

कभी ना निकली घर से मै टाफी, बिस्कुट खाने को,

रोक दिया उस वक्त कदम जब दौड़ी पंख लगाने को।

ईटा ,पत्थर ; मोहे तू सबै बनाय दीजो!

पर हे मालिक! मेरी इतनी सी सुन लीजो,

अगले जनम मोहे बिटिया ना कीजो ।

S

Sristi Mishra

वॉक्सी टॉक्सी के लेखक

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