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मंत्री हरसिमरत कौर ने कृषि बिल के विरोध में दिया था इस्तीफा, राष्ट्रपति ने किया मंजूर

केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर बादल ने मोदी कैबिनेट से इस्तीफ़ा देकर अपनी पार्टी शिरोमणि अकाली दल के कड़े रुख़ का संकेत दिया है।

प्रधानमंत्री मोदी की सिफारिश पर खाद्य एवं प्रसंस्करण मंत्री हरसिमरत कौर का इस्तीफा राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के द्वारा मंजूर कर लिया गया है, दरअसल हरसिमरत कौर ने कल कृषि से जुड़े बिल के विरोध में इस्तीफा दिया था।

इस्तीफा देकर ट्वीट में क्या कुछ कहा हरसिमरत कौर ने

केंद्रीय मंत्री पद से इस्तीफ़ा देने के बाद हरसिमरत कौर बादल ने ट्वीट किया, “मैंने केंद्रीय मंत्री पद से किसान विरोधी अध्यादेशों और बिल के ख़िलाफ़ इस्तीफ़ा दे दिया है, किसानों की बेटी और बहन के रूप में उनके साथ खड़े होने पर गर्व है.”

I have resigned from Union Cabinet in protest against anti-farmer ordinances and legislation. Proud to stand with farmers as their daughter & sister.— Harsimrat Kaur Badal (@HarsimratBadal_) September 17, 2020

I have resigned from Union Cabinet in protest against anti-farmer ordinances and legislation. Proud to stand with farmers as their daughter & sister.

— Harsimrat Kaur Badal (@HarsimratBadal_) September 17, 2020

कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर को दिया गया अतिरिक्त प्रभार

हरसिमरत कौर के इस्तीफे के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर को खाद्य एवं प्रसंस्करण मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार दिया है, राष्ट्रपति कार्यालय की ओर से जारी की गई अधिसूचना में कहा गया कि प्रधानमंत्री की सलाह के बाद कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर को हरसिमरत कौर के विभाग का अतिरिक्त प्रभार दे दिया गया है।

वर्तमान परिदृश्य में अर्थव्यवस्था की समीक्षा कैसे करे?

वर्तमान परिदृश्य में अर्थव्यवस्था की समीक्षा कैसे करे?

बिल को लेकर प्रधानमंत्री ने समर्थन में किया ट्वीट

विपक्ष के कड़े विरोध के बाद भाजपा के सहयोगी दल के मंत्री द्वारा इस्तीफे की घोषणा पर प्रधानमंत्री ने लिखा-जो लोग इस बिल का विरोध कर रहे हैं, वो देश की जनता को दिग्भ्रमित कर रहे हैं जबकि इस बिल में ऐसा कुछ भी नहीं है।

मैं देश के किसानों को स्पष्ट संदेश देना चाहता हूं। आप किसी भी भ्रम में मत पड़िए।जो लोग किसानों की रक्षा का ढिंढोरा पीट रहे हैं, दरअसल वे किसानों को अनेक बंधनों में जकड़कर रखना चाहते हैं।वे बिचौलियों का साथ दे रहे हैं, वे किसानों की कमाई लूटने वालों का साथ दे रहे हैं। pic.twitter.com/dZlnxV591F— Narendra Modi (@narendramodi) September 18, 2020

मैं देश के किसानों को स्पष्ट संदेश देना चाहता हूं। आप किसी भी भ्रम में मत पड़िए।

जो लोग किसानों की रक्षा का ढिंढोरा पीट रहे हैं, दरअसल वे किसानों को अनेक बंधनों में जकड़कर रखना चाहते हैं।

वे बिचौलियों का साथ दे रहे हैं, वे किसानों की कमाई लूटने वालों का साथ दे रहे हैं। pic.twitter.com/dZlnxV591F

— Narendra Modi (@narendramodi) September 18, 2020

केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर बादल ने मोदी कैबिनेट से इस्तीफ़ा देकर अपनी पार्टी शिरोमणि अकाली दल के कड़े रुख़ का संकेत दिया है। शिरोमणि अकाली दल लंबे समय से बीजेपी की सहयोगी पार्टी रही है। हरसिमरत का इस्तीफ़ा तीन अध्यादेशों के खिलाफ़ है। ये तीन अध्यादेश हैं- उत्पाद, व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) अध्यादेश 2020, किसान सशक्तीकरण और संरक्षण अध्यादेश और आवश्यक वस्तु (संशोधन)।

अकाली दल के प्रमुख सुखबीर सिंह बादल का कहना है कि उनकी पार्टी से इन अध्यादेशों को लेकर संपर्क नहीं किया गया, जबकि हरसिमरत कौर ने इसे लेकर आपत्ति जताई थी और कहा था कि ‘पंजाब और हरियाणा के किसान इससे ख़ुश नहीं हैं।

मोदी सरकार (Modi Government) ने कृषि संबंधी दो बिल (Agri Bill 2020) बृहस्पतिवार को लोकसभा में पास करवा लिए है। एनडीए की सहयोगी शिरोमणि अकाली दल से आने वाली केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर बादल ने इसके विरोध में इस्तीफा दे भी दे दिया।

किसान नेताओं में भी सरकार के खिलाफ काफी गुस्सा है। उनका कहना है कि ये बिल उन अन्नदाताओं की परेशानी बढ़ाएंगे जिन्होंने अर्थव्यवस्था को संभाले रखा है। कांट्रैक्ट फार्मिंग (Contract Farming) में कोई भी विवाद होने पर उसका फैसला सुलह बोर्ड में होगा। जिसका सबसे पावरफुल अधिकारी एसडीएम को बनाया गया है।

इसकी अपील सिर्फ डीएम यानी कलेक्टर के यहां होगी। इस मुद्दे को लेकर पंजाब में किसान ट्रैक्टर आंदोलन कर चुके हैं और व्यापारी चार राज्यों में मंडियों की हड़ताल करवा चुके हैं। कुल मिलाकर इसके खिलाफ किसान और व्यापारी दोनों एकजुट हो गए हैं। हालांकि, केंद्र सरकार इसे कृषि सुधार (Agri reform) की दिशा में मास्टर स्ट्रोक बता रही है।

आइए जानते हैं कि आखिर वो कौन से पहलू हैं जिन्हें लेकर किसानों और व्यापारियों दोनों की चिंता बढ़ गई है। इन कानूनों को लेकर किस बात का डर है, जिसे सरकार अर्थव्यवस्था नायकों के दिमाग से निकाल नहीं पा रही है या फिर किसानों-व्यापारियों का अपने भविष्य को लेकर आकलन ठीक है? दोनों पक्षों का क्या कहना है।

मूल्य आश्वासन पर किसान (बंदोबस्ती और सुरक्षा) समझौता और कृषि सेवा कानून

सरकारी दावे: इस कानून को सरकार ने कांट्रैक्ट फार्मिंग के मसले पर लागू किया है। इससे खेती का जोखिम कम होगा और किसानों की आय में सुधार होगा। समानता के आधार पर किसान प्रोसेसर्स, थोक विक्रेताओं, बड़े खुदरा कारोबारियों, निर्यातकों आदि के साथ जुड़ने में सक्षम होगा। किसानों की आधुनिक तकनीक और बेहतर इनपुट्स तक पहुंच सुनिश्चित होगी। मतलब यह है कि इसके तहत कांट्रैक्ट फार्मिंग को बढ़ावा दिया जाएगा। जिसमें बड़ी-बड़ी कंपनियां किसी खास उत्पाद के लिए किसान से कांट्रैक्ट करेंगी। उसका दाम पहले से तय हो जाएगा। इससे अच्छा दाम न मिलने की समस्या खत्म हो जाएगी।

किसानों का डर: अन्नदाताओं के लिए काम करने वाले संगठनों और कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि इस कानून से किसान अपने ही खेत में सिर्फ मजदूर बनकर रह जाएगा। केंद्र सरकार पश्चिमी देशों के खेती का मॉडल हमारे किसानों पर थोपना चाहती है। कांट्रैक्ट फार्मिंग में कंपनियां किसानों का शोषण करती हैं। उनके उत्पाद को खराब बताकर रिजेक्ट कर देती हैं। दूसरी ओर व्यापारियों को डर है कि जब बड़े मार्केट लीडर उपज खेतों से ही खरीद लेंगे तो आढ़तियों को कौन पूछेगा?मंडी में कौन जाएगा?

अवमानना मामला : सर्वोच्च न्यायालय ने प्रशांत भूषण पर लगाया एक रुपये का जुर्माना, न देने पर तीन महीने की जेल।

अवमानना मामला : सर्वोच्च न्यायालय ने प्रशांत भूषण पर लगाया एक रुपये का जुर्माना, न देने पर तीन महीने की जेल।

कृषि उपज वाणिज्य एवं व्यापार-संवर्धन एवं सुविधा कानून

सरकारी दावे: इस कानून के लागू हो जाने से किसानों के लिए एक सुगम और मुक्त माहौल तैयार हो सकेगा, जिसमें उन्हें अपनी सुविधा के हिसाब से कृषि उत्पाद खरीदने और बेचने की आजादी होगी। ‘एक देश, एक कृषि मार्केट’ बनेगा।

कोई अपनी उपज कहीं भी बेच सकेगा। किसानों को अधिक विकल्प मिलेंगे, जिससे बाजार की लागत कम होगी और उन्हें अपने उपज की बेहतर कीमत मिल सकेगी,इस कानून से पैन कार्ड धारक कोई भी व्यक्ति, कंपनी, सुपर मार्केट किसी भी किसान का माल किसी भी जगह पर खरीद सकते हैं।

कृषि माल की बिक्री कृषि उपज मंडी समिति (APMC) में होने की शर्त हटा ली गई है। जो खरीद मंडी से बाहर होगी, उस पर किसी भी तरह का टैक्स नहीं लगेगा।

किसानों का डर: जब किसानों के उत्पाद की खरीद मंडी में नहीं होगी तो सरकार इस बात को रेगुलेट नहीं कर पाएगी कि किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) मिल रहा है या नहीं।

एमएसपी की गारंटी नहीं दी गई है। किसान अपनी फसल के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी मांग रहे हैं। वो इसे किसानों का कानूनी अधिकार बनवाना चाहते हैं, ताकि तय रेट से कम पर खरीद करने वाले जेल में डाले जा सकें।

इस कानून से किसानों में एक बड़ा डर यह भी है कि किसान व कंपनी के बीच विवाद होने की स्थिति में कोर्ट का दरवाजा नहीं खटखटाया जा सकता। एसडीएम और डीएम ही समाधान करेंगे जो राज्य सरकार के अधीन काम करते हैं। क्या वे सरकारी दबाव से मुक्त होकर काम कर सकते हैं?

व्यापारियों का कहना है कि सरकार के नए कानून में साफ लिखा है कि मंडी के अंदर फसल आने पर मार्केट फीस लगेगी और मंडी के बाहर अनाज बिकने पर मार्केट फीस नहीं लगेगी। ऐसे में मंडियां तो धीरे-धीरे खत्म हो जाएंगी। कोई मंडी में माल क्यों खरीदेगा? उन्हें लगता है कि यह आर्डिनेंस वन नेशन टू मार्केट को बढ़ावा देगा।

आखिरकार छात्रों ने एक बार फ़िर अपने दिल के अरमान पूरे कर लिए, प्रधानमंत्री के जन्मदिन पर राष्ट्रीय बेरोजगार दिवस ट्रेंड कर रहा है।

आखिरकार छात्रों ने एक बार फ़िर अपने दिल के अरमान पूरे कर लिए, प्रधानमंत्री के जन्मदिन पर राष्ट्रीय बेरोजगार दिवस ट्रेंड कर रहा है।

एशेंसियल कमोडिटी एक्ट में संशोधन को मिली मंजूरी

सरकार का दावा: देश में ज्‍यादातर कृषि उत्पाद सरप्‍लस हैं, इसके बावजूद कोल्‍ड स्‍टोरेज और प्रोसेसिंग के अभाव में किसान अपनी उपज का उचित मूल्‍य पाने में असमर्थ रहे हैं।

क्‍योंकि आवश्‍यक वस्‍तु अधिनियम की तलवार लटकती रहती थी। ऐसे में जब भी जल्दी खराब हो जाने वाली कृषि उपज की बंपर पैदावार होती है, तो किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ता था, इसलिए आवश्‍यक वस्‍तु अधिनियम में संशोधन करके अनाज, खाद्य तेल, तिलहन, दालें, प्याज और आलू आदि को इस एक्‍ट से बाहर किया गया है।

इसके साथ ही व्यापारियों द्वारा इन कृषि उत्पादों की एक लिमिट से अधिक स्टोरेज पर लगी रोक हट गई है। जब सरकार को जरूरत महसूस होगी तो वो फिर से पुरानी व्यवस्था लागू कर देगी।

किसानों का डर: एक्ट में संशोधन बड़ी कंपनियों और बड़े व्यापारियों के हित में किया गया है। ये कंपनियां और सुपर मार्केट सस्ते दाम पर उपज खरीदकर अपने बड़े-बड़े गोदामों में उसका भंडारण करेंगे और बाद में ऊंचे दामों पर ग्राहकों को बेचेंगे।

क्यों अस्तित्व में आया था ये एक्ट

पहले व्यापारी किसानों से उनकी उपज को औने-पौने दाम में खरीदकर पहले उसका भंडारण कर लेते थे। बाद में उसकी कमी बताकर कालाबाजारी करते थे। उसे रोकने के लिए ही एसेंशियल कमोडिटी एक्ट बनाया गया था। जिसके तहत व्यापारियों द्वारा कृषि उत्पादों के एक लिमिट से अधिक भंडारण पर रोक थी। लेकिन अब इसमें संशोधन करके सरकार ने उन्हें कालाबाजारी करने की खुली छूट दे दी है।

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आयुष तिवारी

वॉक्सी टॉक्सी के लेखक

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