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आज का इतिहास

एक रिपोर्ट जिसने रातों-रात बदल दी आबादी के 52 प्रतिशत लोगों की किस्मत

हम बात कर रहे हैं दूसरे पिछड़ा वर्ग आयोग की जिसे मंडल कमीशन के नाम से भी जाना जाता है। बी. पी. मंडल(बिन्देश्वरी प्रसाद मंडल) की अध्यक्षता में लिखी गई रिपोर्ट जिसके कारण यह संभव हो सका कि पिछड़े वर्ग को केंद्र सरकार की नौकरियों में 27 फीसदी आरक्षण मिल सका।

इसी आयोग ने सिफारिश की थी कि केंद्रीय शिक्षण संस्थानों में होने वाले दाखिलों में भी छात्रों को आरक्षण मिले। उसी सिफारिश के कारण यह लागू हो सका कि पिछड़े वर्ग के छात्रों को केंद्रीय शिक्षा संस्थानों में भी 27 फीसदी आरक्षण मिल सका।

मंडल आयोग की रिपोर्ट ने भारत के सामाजिक लोकतंत्र की बुनियाद को और मजबूत करने का प्रयास किया तथा देश की बड़ी आबादी जो कि पिछड़ी थी, उनको भारत के लोकतंत्र के प्रति आस्था पैदा हुई तथा यह विश्वास भी हुआ कि इस देश के संसाधनों और अवसरों में उनकी भी हिस्सेदारी है और वह भी इस देश की लोकतांत्रिक बुनियाद का हिस्सा हैं।

मंडल कमीशन की रिपोर्ट भारत में सामाजिक लोकतंत्र लाने कोशिश कर रही थी तथा राष्ट्र निर्माण में उनका(पिछड़े वर्ग) भी योगदान ऐसा उन्हें आश्वस्त कर रही थी। आजादी के बाद शायद पहली ऐसी कोई पहल थी जिससे इन वर्गों के लाखों लोगों को सरकारी क्षेत्रों में नौकरी वा शिक्षण संस्थानों में दाखिले मिल सके और पूर्व में जैसा कि इन्हें यह प्रतीत हो रहा था कि यह वर्ग भारतीय गणराज्य के नागरिक ही ना हो यह बात झूठी हो रही थी।

हां यह बात जरूर दुखद है कि मंडल आयोग ने अपनी रिपोर्ट में 40 सिफारिशें की थी जिसमें अभी बहुत सिफारिश पर अमल होना बाकी है। मंडल कमीशन की रिपोर्ट आने के साथ-साथ भारत में कई नए नेताओं का उदय भी हो रहा था इसमें खासकर उत्तर भारत में, जिसमें पिछड़े वर्ग की महत्वाकांक्षाओं में एक विस्फोट देखा जा सका।

राजनीति में पिछड़ों की दावेदारी मजबूत हुई और उन्होंने अपनी किस्मत अपने हाथ से लिखने का जज्बा पैदा किया। 80 के दशक में लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव तथा नीतीश कुमार और पिछड़ी जातियों के तमाम नेताओं का राजनीति में आना, इसी की पृष्ठभूमि थी।

भारत की राजनीति में यह एक अद्भुत क्रांति थी जिसने लोकतांत्रिक प्रक्रिया में एक बड़े हिस्से को अपनी और आकर्षित किया और उसकी ताकत का एहसास कराया। बी. पी. मंडल की मंडल अध्यक्षता में लिखी गई रिपोर्ट ने भारत की तकदीर लिखने वालों में बी. पी. मंडल का नाम बड़े सम्मान के साथ दर्ज करा दिया।

बिहार राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और भारत सरकार के द्वारा गठित दूसरे पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष मंडल का जन्म 25 अगस्त 1918 को बनारस में हुआ था। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया और देश की आजादी में भी उनका एक अहम योगदान रहा। स्वतन्त्रता के बाद राजनीति में भी इनका खासा वर्चस्व रहा।

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जब मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू होने पर सवर्ण वर्ग के पढ़े लिखे नौजवानों ने वी पी सिंह मुर्दा बाद की तख्तियां थाम लीं

7 अगस्त 1990 को जब तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंडल कमीशन की रिपोर्ट को लागू करने का ऐलान किया तो देश जातीय समीकरण के उन्माद में उलझ गया। मंडल की सिफारिशों के अनुसार सरकारी नौकरियों तथा केंद्रीय शिक्षण संस्थान में पिछड़े वर्ग को 27 फ़ीसदी आरक्षण देने की बात कही गई थी जो कि पहले से चली आ रही आरक्षण व्यवस्था 22.5 फीसदी अनुसूचित जाति /जनजाति को मिलने वाले से अलग था जिससे आरक्षण का कुल प्रतिशत 49.5 प्रतिशत हो गया था।

बेरोजगारी और सिस्टम की नाकामियों ने नौजवानों को आग बबूला कर दिया था।

दिल्ली विश्वविद्यालय, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय ,जेएनयू ,पटना विश्वविद्यालय के छात्र आरक्षण के मुद्दों को लेकर सड़कों पर उतर आए। आंदोलन को जितना दबाने की कोशिश की गई वह उतना ही उग्र होता गया।

इन सब से दूर दिल्ली में अलग ही सियासत गुलजार हो रही थी। वो जानते थे कि आरक्षण का तीर उनके लिए वोट के ब्रह्मास्त्र का काम करेगा। क्योंकि मंडल कमीशन की सिफारिशों का असर सबसे ज्यादा उत्तर भारत की राजनीति में हुआ, तब उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड वा झारखंड और बिहार एक ही राज्य हुआ करते थे। देश में 2 नए राज्य अभी नहीं बने थे।

तो इस हिसाब से बिहार की 54 सीटें और उत्तर प्रदेश की 85 सीटें कुल मिलाकर 139 सीट लोकसभा की कुल सीटों का एक चौथाई भाग जो प्रधानमंत्री की कुर्सी के लिए सबसे आसान सीढ़ी बन सकती थी।

आरक्षण के नाम पर जहाँ सवर्णों में खासी नाराजगी थी तो पिछड़ों में उसका उत्साह था वह सरकारी नौकरियों में अपनी आरक्षित भागीदारी से खुश हो गए थे।

यहां समाज टुकड़ों में बंट रहा था और इस बंटे हुए समाज में जैसे भारत का लोकतंत्र कहीं लहूलुहान हो रहा था।

सवर्ण वर्ग के लिखने-पढ़ने वाले नौजवानों ने हाथों में बीपी सिंह मुर्दाबाद की तख्तियां थाम ली थी।

पुलिस प्रशासन का डंडा छात्रों पर कहर बनकर टूट रहा था तो कई छात्रों ने विरोध में खुद को आग लगा ली थी, तो कई हमेशा के लिए अपनी पहचान खोते चले गए।

इस तरह मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू होने के पीछे का एक पहलू यह भी था।

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आयुष तिवारी

वॉक्सी टॉक्सी के लेखक

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