बाबा साहेब डॉ. भीमराव रामजी अम्बेडकर की 129वीं जयंती पर समर्पित

भारत रत्न, बोधिसत्व, बाबा साहेब डॉ. भीमराव रामजी अम्बेडकर का जन्म 14 अप्रैल, 1891 को मऊ छावनी, जिला इंदौर, मध्य प्रदेश में हुआ था। बाबा साहेब का मूल निवास गांव आम्बाबाडे दापोली, जिला रत्नागिरी,महाराष्ट्र था। पिता का नाम रामजी मालोजी सकपाल और माता का नाम भीमाबाई रामजी सकपाल (आंबेडकर) था। दादा का नाम मालोजी सकपाल एवं परदादा का नाम सकपाल था। कबीरपंथी परिवार में जन्मे डॉ. अम्बेडकर अपने माता-पिता की 14वीं संतान थे। 06 दिसम्बर, 1956 को बाबा साहेब का परिनिर्माण हुआ। महार (जाति) समाज में जन्म होने से डा. अम्बेडकर जीवन भर छुआछूत का शिकार होते रहे।
डॉ० अम्बेडकर ने 1907 में मैट्रिक (हाईस्कूल), 1909 में एफ०ए० (इंटरमीडिएट), बी०ए० 1912 में, 1915 में एम०ए० (कोलम्बिया वि०वि० अमेरिका) पास किया। “भारत का राष्ट्रीय लाभांश-एक ऐतिहासिक और विश्लेषणात्मक अध्ययन” (National Dividend of India – A Historic and Analytical Study)नामक विषय पर शोध प्रबन्ध लिखा जिस पर कोलम्बिया विश्वविद्यालय ने उन्हें पी.एच.डी. की उपाधि प्रदान की।
बाबासाहेब को डिग्री प्राप्त करने के लिए शोध निबन्ध को प्रकाशित करके उसकी कुछ प्रतियां कोलंबिया विश्वविद्यालयको देना आवश्यक था, परन्तु डॉ० अम्बेडकर के पास इतने पैसे नहीं थे कि वह इस शोध प्रबन्ध को प्रकाशित करवा सके। आखिरकार वह शोध प्रबन्ध पी.एस. किंग एण्ड सन्स नामक प्रकाशन संस्था की ओर से “ब्रिटिश भारत में प्रान्तीय अर्थव्यवस्था का विकास” (The Evolution of Provincial Finance in British India) जिसके बाद 8 जून 1927 को, उन्हें औपचारिक रूप से पी.एच.डी. की डिग्री कोलंबिया विश्वविद्यालय मिली।
इसके बाद उन्होंने 1921 में स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स एंड पोलिटिकल साइंस, लन्दन से एम.एस.सी. की डिग्री और 1923 में उन्होंने मशहूर “रूपये की समस्या:उद्भव और समाधान” (The problem of the rupee: Its origin and its solution) प्रकाशित करवा कर डी.एससी(Doctor of Science) की उपाधि प्राप्त की।
05 जून 1952 को कोलंबिया विश्वविद्यालय अमेरिका ने उन्हें भारतीय संविधान के निर्माण में विशेष योगदान के लिए डाक्टर ऑफ लॉ “एल.एल.डी.” की उपाधि से सम्मानित किया और उनको महान सामाजिक परिवर्तक बताया और उनकी फोटो लगवाई। 12 जनवरी, 1953 को भारत की उस्मानिया, हैदराबाद डेकन ने उनको डी.लिट् की उपाधि से सम्मानित किया।
डॉ. अम्बेडकर महार समाज में मैट्रिक की परीक्षा पास करने वाले पहले व्यक्ति थे। महार (जाति) समाज में जन्म होने के कारण हरएक स्तर पर अपमानित किया जाता था।
यह भी पढ़ें : कोरोना ने कैसे सबको बौद्ध विनय अपनाने पर बाध्य कर दिया ?
बिर्टिश सरकार ने 1923 में सभी समाज के लिए सार्वजनिक स्थानों को प्रयोगार्थ खोलने का प्रस्ताव पारित किया, परन्तु अछूत समाज के लोग इसके प्रयोग के लिए साहस नहीं जुटा पा रहे थे। डॉ. अम्बेडकर ने अछूत समाज को अधिकार दिलाने के लिए 1924 में बहिष्कृत हितकारिणी सभा का गठन किया।
1927 में सार्वजानिक चोबदार महाड़ तालाब, जिला कोलाबा (महाराष्ट्र) में अछूतों को पानी पिलाने के लिए जल सत्याग्रह किया। 1930 में कालाराम मंदिर जिला नासिक में अछूतों को प्रवेश दिलाने के लिए सत्याग्रह किया। डॉ. अम्बेडकर आन्दोलनों से यह सिद्ध (स्पष्ठ) करना चाहते थे कि अछूत हिन्दू है या नहीं ?
डॉ. अम्बेडकर ने 1936 में लाहौर के जात पात तोड़क मंडल में जब भारत रत्न डाक्टर साहब ने अपने प्रस्तावित भाषण को लिखकर भेजा तो मंडल के सदस्यों ने भाषण में बदलाव चाहे पर बाबा साहेब ने इससे इंकार कर दिया। जिसे बाद में ‘एनहाइलेशन ऑफ़ कास्ट’ या जाति प्रथा का विनाश नाम से प्रकाशित कर दिया। 12-13 फरवरी 1938 को मनमाड, महाराष्ट्र अछूत रेलवे मजदूर संघ का सम्मलेन हुआ, जिसमें डॉ. अम्बेडकर ने कहा कि अछूत मजदूरों के दो प्रमुख शत्रुओं में प्रथम ब्राम्हणवाद और दूसरा पूंजीवाद हैं।
जुलाई 1942 नागपुर में अखिल भारतीय अछूत वर्ग के सम्मलेन में उन्होंने कहा कि हमारा संघर्ष धन दौलत कमाने के लिए नहीं है, बल्कि सामाजिक आजादी, बराबरी और सम्मान पाने के लिए है।
डॉ. अम्बेडकर ने 13 अक्टूबर 1935 में हिन्दू धर्म को छोड़कर किसी अन्य धर्म में जाने की घोषणा कर दी, जिससे हिन्दू धर्म सहित अन्य धर्मों के प्रमुखों में भूचाल सा आ गया। विभिन्न धर्मों के प्रमुख, राजा और नबाब अपने धर्म में लाने के लिए घेरने लगे।
10 जून 1936 को इटली के बौद्ध भिक्खु लोकनाथ अपने संघ के साथ बम्बई में मिले और बौद्ध धर्म के बारे में विस्तार से चर्चा की। 1954 को रंगून (बर्मा) में तृतीय विश्व बौद्ध सम्मलेन में उन्होंने कहा कि भारत में जन्मे बुद्ध ने सरे संसार में मानवता का आलोक फैलाया है, परन्तु मुझे खेद है कि मै भारतीय होकर भी बौद्ध नहीं हूँ। फिर भी मेरा विश्वास है कि भारत में अभी बुद्ध धम्म की जड़ें अभी सूखी नहीं है और भारत में एक बार पुनः बुद्ध का धम्म चक्क घूमेगा। इसी समय वहां के भिक्खु संघ ने डॉ. भीमराव अम्बेडकर को ‘बोधिसत्व’ की उपाधि प्रदान की।
भारत रत्न डॉ. अम्बेडकर ने नवम्बर 1951 से दिसम्बर 1956 तक “द बुद्धा एण्ड हिज धम्मा” (भगवन बुद्ध और उनका धम्म) नामक ग्रथ की रचना की। उनका मत था कि 84 हजार बुद्ध एवं बौद्ध मतों के सुत्तों को आमजन द्वारा जानना लगभग असंभव है, इसलिए उन्होंने बुद्ध के उपदेशों को सर रूप में समाहित करके इस ग्रथ की रचना की। 14 अक्टूबर 1956 दशहरा के दिन बौद्धों की राजधानी नागपुर में लगभग 10 लाख लोगों ने भाग लिया और वे बुद्धं सरणं गच्छामि, धम्मं सरणं गच्छामि, संघं सरणं गच्छामि कहते हुए बुद्ध की सरण में चले गये। उन्होंने कहा कि आज मैं हिन्दू धर्म व्यवस्था के भारी बोझ से मुक्त हो गया हूँ, अब हमे कोई अछूत नहीं कहेगा क्योंकि हमे अपनी पूर्वजों की न्याय, समता एवं मैत्री पर आधारित धम्म मिल गया है।
डॉ. अम्बेडकर को धम्म दीक्षा भदन्त चन्द्रमणि (कुशीनगर) ने दी और इसके उपरांत उन्होंने लगभग 10 लाख लोगों को पहले 22 प्रतिज्ञाओं की शपथ दिलाई। एक प्रेस नोट में बोधिसत्व डॉ. बाबा साहब ने कहा कि बुद्ध का धम्म मानवतावादी, वैज्ञानिक एवं स्वदेशी है और इस संसार में इससे सरल कोई चर्या नहीं है।
भारत रत्न, बोधिसत्व, बाबा साहेब डॉ. भीमराव रामजी अम्बेडकर के जन्म दिवस (14 अप्रैल) अवसर पर बहुत-बहुत हार्दिक मंगल कामनाएं। सादर जय भीम, नमो बुद्धाय, भवतु सब्ब मंगलं।



