राष्ट्रपिता महात्मा ज्योतिराव फुले जयंती पर जानें आख़िर कौन थे उनके प्रेरणास्त्रोत ?

1848 मे ही राष्ट्रपिता महात्मा ज्योतिराव फुले ने ब्राह्मणवाद के मजबूत किले मे सेंध लगाकर उसे जर्जर करने का काम किया, तब उनकी उम्र केवल 21 साल थी और आज राष्ट्रपिता महात्मा ज्योतिराव फुले हम सभी मूलनिवासी बहुजनों के प्रेरणास्त्रोत हैं। उनका जन्म 11 अप्रैल 1827 में हुआ। जब वे 21 साल के थे, तो उन्हे भी प्रेरणा की जरूरत थी और उन्होंने सत्य शोधक समाज की स्थापना भी की, वो प्रेरणा उन्हें कुलवाडीभुषण बहुजन प्रतिपालक छत्रपति शिवाजी महाराज से मिली।
राष्ट्रपिता महात्मा ज्योतिराव फुले पुना से रायगड आए और रायगड किले पर कुलवाडी भुषण बहुजन प्रतिपालक छत्रपति शिवाजी महाराज की समाधि ढुंढ कर उस पर श्रद्धा सुमन अर्पीत कर सबसे पहले सार्वजनिक शिवाजी जयंती उत्सव की शुरुवात की। राष्ट्रपिता फुले कहते है कि जब वे छत्रपति शिवाजी महाराज कि समाधि पर श्रद्धा सुमन अर्पण कर रहे थे तब नीचे के गाँव से एक जोशी ब्राह्मण आया और कहने लगा कि ”मैं ग्राम जोशी होते हुए भी मुझे दान दक्षिणा पूछे बगैर तुने कुणबी (कुर्मी) शिवाजी को भगवान बना दिया ? जो शूद्रों का राजा था” और उसने छत्रपति शिवाजी महाराज की समाधि पर लात मार कर वे सारे फूल फेंक दिए।
राष्ट्रपिता फूले कहते हैं ”कि तब तो उन्हें इतना गुस्सा आया कि उस ग्राम जोशी को पटक दे। परंतु उन्होने संयम रखा और कुलवाडी भुषणबहुजन प्रतिपालक छत्रपति शिवाजी महाराज पर मराठी मे पहला पोवाळा (गीत) लिखा और दूसरा गीत लिखा मोहम्मद पैगंबर साहब पर। डॉ बाबासाहब अंबेडकर के अनुसार उन्हे मराठी, अंग्रेजी, उर्दु ,कन्नड, मद्रासी तथा गुजराती ऐसी छह भाषाएँ आती थीं। राष्ट्रपिता महात्मा फूले ने तर्क पर आधारित ‘सार्वजनिक सत्य धर्म ‘ विकसित किया (Dr Ambedkar vol 19, page 502)।
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ब्राह्मण शूद्रों को अपने मतलब परस्त ग्रंथो से हजारो सालों से नीच मानकर उन्हें धोखे से लूटते रहे, इसलिए शूद्रों को उनके वास्तविक अधिकारों से अवगत कराने तथा ब्राह्मण की गुलामगीरी से मुक्त कराने राष्ट्रपिता महात्मा फूले ने 24 सितंबर 1873 को सत्य शोधक समाज की स्थापना की। उनका आग्रह था कि प्रत्येक बहुजन ने अपनी सभी सामाजिक विधियाँ किसी भी पुजारी के बगैर खुद ही करनी चाहिए ताकि शोषक पुजारी वर्ग विकसित ही न हो सके।
सत्य शोधक समाज की शालाओं में लोगों को सिखाया जाता था कि शादी, जन्म, मृत्यु व सामाजिक विधियों को बिना किसी अंधविश्वास से कैसे अंजाम देना चाहिए। 1914 मे सत्यशोधको ने स्वयं पुरोहित तथा घरका पुरोहित नामक किताबें प्रकाशित की (गेल आँमव्हेट page 84, 147,152)। राष्ट्रपिता महात्मा फूले के अनुसार ब्राह्मण अपनी शोषक वृत्ती को छोड़ना ही नही चाहता इसलिए हर बात में खुराफतें करता रहता है, इसलिए हमें ब्राह्मण की संगति नहीं करनी चाहिए क्योकी उनका स्वार्थ आते ही वे शूद्रों को धोखा देते हैं(महात्मा फुले समग्र लिखित साहित्य page 467,470)।
राष्ट्रपिता महात्मा फूले के अनुसार शूद्र बहुजनों ने आर्य ब्राह्मण को दान मे जूतें और लाठियाँ देनी चाहिए। जब तक शूद्र अपने मानवी हकों से वाकिफ़ नहीं हो जाए तब तक इनको आर्य भटो से कौन बचाएगा? इसलिए आर्य भटो ने अपने दुष्कार्य छोड़ देना चाहिए, तब भविष्य मे उनकी संतानो को कोई डर नही रहेगा (म. फुले समग्र लिखित साहित्य page 478,489)।
राष्ट्रपिता फूले कहते हैं कि शुरू मे मेरे सहकर्मी ब्राह्मण थे परंतु जब मै विध्यार्थीयो के सामने ब्राह्मणों व उनके पुर्खो की धोखेबाजी उजागर कर रहा था तो ब्राह्मणों मे और मुझमे झगड़े होने लगे और बाद मे वे सारे मुझे छोड़ कर चले गए। इसका मतलब है की ब्राह्मण हमे अक्षरज्ञान तो देना चाहता है, परन्तु तब जब हम पढ़ लिख कर ब्राह्मणों के समर्थन मे बोलने वाले पोपट बन जाए। उसके बाद तो ब्राह्मण हमे पद्मश्री ,पद्मभुषण, विश्वविद्यालयो के कुलगुरु, मंत्री प्रधानमंत्री भी बना देंगे।
परंतु अगर हम लोगों को जागरूक कर रहे हैं तो ये ब्राह्मण कतई बर्दाश्त नही करेगें। आगे राष्ट्रपिता महात्मा फुले कहते है कि बहुजनों के शिक्षक भी बहुजन ही होने चाहिए। बहुजनों के शिक्षक ब्राह्मण होने का मतलब बहुजनों की शिक्षा को मिट्टी मे मिलाना है। डॉ बाबासाहब का भी यही कहना है डॉ बाबासाहब अंबेडकर के मुताबिक जातीयता जिनकी नस-नस मे बसी है जो औरों को जानवर से बदतर समझते हैं, ऐसे लोगो को शिक्षक बनाकर और कितने दिन समाज का बंटाधार किया जाएगा? (Dr Ambedkar vol 19 page 146-47)।
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राष्ट्रपिता महात्मा फुले ने बहुजनों के लिए खोली हुई शाला की मातंग समाज की 11 साल की छात्रा मुक्ता सालवे अपने निबंध मे कहती है कि अगर हमें वेद पढ़ने का अधिकार नही है अगर ये हमारे धर्मग्रंथ नही तो फिर हमारा धर्म कौनसा है ? बाबासाहब अंबेडकर ने 14 अक्तूबर 1956 को नागपुर मे बौद्ध धर्म मे प्रवेश करने की जो भूमिका रखी उसका पहला हुँकार मा. मुक्ता सालवे के इस सवाल मे देखा जा सकता है। राष्ट्रपिता महात्मा फुले ने विश्व मे पहली बार “जिसकी जितनी संख्या भारी उसकी उतनी भागीदारी” का सिद्धांत प्रस्तुत करके बहुजनों को हर क्षेत्र मे भागीदारी प्रदान करने का अनुरोध किया (महात्मा फूले समग्र लेखन साहित्य page582)।
डॉ बाबा साहब अंबेडकर ने बंबई के पूरँदरे स्टेडियम मे 28 अक्तूबर 1954 मे दिए अपने भाषण मे कहा की बुद्ध, कबीर और ज्योतिराव फुले मेरे तीन गुरु है। ज्योतिराव फुले गैरब्राह्मणों के सच्चे गुरु थे। शुरू में हम सभी बहुजन पहले राजनीति मे उन्ही के बताए हुए रास्ते पर चल रहे थे। आगे चलकर मराठा समाज के कुछ लोग हमसे बिछड़ गए कोई कांग्रेस मे तो कोई हिंदू महासभा मे गए। कोई चाहे जहाँ भी जाए लेकिन हम ज्योतिराव फुले के रास्ते से ही जाएँगे (संघर्षासाठि मुलनिवासी भारत 9 अप्रैल 2006)।
राष्ट्रपिता महात्मा फुले ने जीवन भर मूलनिवासी बहुजनों को ब्राह्मणवाद के चँगुल से बचाने और उन्हे जागरूक करने का कार्य किया। उनके कार्य से प्रभावित बंबई मे लाखो लोगो ने राष्ट्रपिता ज्योतिराव फुले को महात्मा की उपाधि दी ऐसे महान क्रांति के महानायक क्रांतिसुर्य राष्ट्रपिता महात्मा ज्योतिराव फुले के महापरिनिर्वाण दिवस (28 नवंबर 1890) पर उनकी स्मृति को विनम्र अभिवादन।
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