भगवान बुद्ध के वचन से कोरोना वायरस की लड़ाई

भगवान बुद्ध के वचन से कोरोना वायरस कि लड़ाई काफी आसान हो जाती है। हमारी सकारात्मक सोच हमारी इस लड़ाई में बहुत अधिक मदद करती है।
एक दुर्घटना हुई, श्रावस्ती के जेतवन में। भगवान पावन संघ के साथ वर्षावास कर रहे थे। श्रावस्ती के जेतवन में भिक्खुओं ने भगवान बुद्ध को सूचित किया कि एक भिक्खु को सांप ने काट लिया है और उसकी मृत्यु हो गयी है। यह सुनते ही भगवान ने कहा- वह भिक्खु मैत्री भावना ध्यान नहीं करता होगा। यदि वह मैत्री भावना करता होता तो सांप उसे नहीं काट सकता था, काट भी लेता तो विष से उसकी मृत्यु नहीं होती। ऐसा था भगवान का धम्म।
यह कह कर भगवान ने खन्द परित्त का संगायन किया और विधान किया कि अब जंगल, पर्वत, कन्दरा, शून्यागार में ध्यान करने से पहले इस परित्त का पाठ करें, उन्हें सांप, बिच्छू, छिपकली, गोजर यानी कनखजूरा आदि विषैले जीव-जन्तुओं से हानि नहीं होगी। कालान्तर में इसी परित्त का तथा इसकी नकल की शब्दावलियों का सांप-बिच्छू के विष को उतारने के लिए ओझा-फ़कीर आदि मंत्रों तथा झाड़-फूंक के रूप में प्रयोग करने लगे।
महापरित्राण पाठ में खन्द परित्त भी समावेशित है।
एक बार भगवान वर्षावास के लिए विशाल भिक्खु संघ के साथ वैशाली पहुँच गये। उस समय वैशाली में दुर्भिक्ष और अकाल पड़ा था, महामारी फैली थी। कुछ बुद्ध विरोधी वैशाली के लोगों ने भगवान बुद्ध से आपत्ति की कि इस विपत्ति के समय आपको वर्षावास के लिए वैशाली नहीं आना चाहिए था, हमारे अपने खाने के लाले पड़े हैं, ऐसे में भिक्खु संघ का पोषण कैसे कर पाएंगे? कुछ ने हितभावना से भी कहा कि ऐसी महामारी के समय भगवान तथा भिक्खुसंघ का प्रवास सुरक्षित नहीं होगा।
भगवान ने कहा कि अब और अब से पूर्व अनेक कल्पों तक देख रहा हूँ कि एक कलछी भात के दान से कोई दरिद्र नहीं हो गया है लेकिन एक कलछी भात के दान के पुण्य से दरिद्रों को सम्राट होते हुए देखा है। तब भगवान ने वैशाली में रतन सुत्त का संगायन किया। वैशाली में घनघोर वर्षा हुई, गणराज्य दुर्भिक्ष व अकाल से मुक्त हुआ। भगवान बुद्ध के वचन व संघ सहित सुखपूर्वक वर्षावास किया और उपासक-उपासिकाओं ने भी अपार श्रद्धा से बुद्ध प्रमुख संघ की सेवा की।
ऐसी बातें अतार्किक, अवैज्ञानिक चमत्कार जैसी लगती हैं लेकिन सूक्ष्म स्तर पर यह गहरे से गहरा विज्ञान है। आज के वैज्ञानिक भी सिद्ध कर रहे हैं कि सकारात्मक तरंगें, पोजिटिव वाइब्रेशन, शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाती हैं तथा नकारात्मक सोच, निगेटिव थिंकिंग, रोगों को जन्म देती है। सकारात्मक-नकारात्मक विचारों व तरंगों पर अध्ययन कर रहे वैज्ञानिकों का निष्कर्ष है कि जब व्यक्ति किसी के प्रेम में होता है, किसी के साथ मैत्रीपूर्ण होता है, किसी उपलब्धि से खुश होता है, उस समय उसके मस्तिष्क में सेरीटोनिन, एंडोर्फिन, ऑक्सीटोसिन, डोपामाइन नामक न्यूरो केमिकल का स्राव होता है, जो कि कुदरती टाॅनिक जैसा होता है। इन्हें केमिकल ऑफ हैप्पीनेस भी कहते हैं।
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जब व्यक्ति क्रोध में होता है, भयग्रसित होता है, ईर्ष्या, नफ़रत से भरा होता है तब मस्तिष्क में एड्रनालाईन नामक हार्मोन का स्राव होता है जिससे रक्तचाप बढ़ जाता है, हृदय गति बढ़ जाती है, अवसाद घेर लेता है तथा रक्त में प्रदूषण घुल जाता है। इसकी बार-बार की पुनरावृत्ति रक्त कैंसर, ट्यूमर, पक्षाघात आदि क्रोनिक डिज़ीज़ हो जाती हैं। लाइलाज बीमारियों के लक्षण निःसंदेह तन पर दिखते हैं लेकिन इनकी गहरी जड़ें मन में होती हैं जो किसी पैथालॉजी जांच की रिपोर्ट में पकड़ में नहीं आतीं।
अस्सी के दशक में साइप्रस के स्ट्रोवोलोस का एक रहस्यदर्शी हुआ है- दास्कालोस। उसने तो बिल्कुल आधुनिक विज्ञान की शब्दावली में सकारात्मक तथा नकारात्मक विचारों के शरीर पर पड़ने वाले प्रभाव की व्याख्या की है।
विज्ञान का सरल-सा नियम है कि जो तरंग जहाँ से उत्पन्न होती है वह लौट कर अपने स्रोत पर आती है। जैसे, पानी की झील में एक कंकड़ फेंकिये तो सतह पर जहाँ वह टकराता है वहाँ से तरंगें उठना शुरू होती हैं और तट तक आकर, टकरा कर वापस अपने स्रोत पर लौटती हैं। किसी बड़े तसले या टब में यह प्रयोग ज्यादा स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है- तरंगों का अपने स्रोत से उठना, बर्तन के किनारों से टकराना, फिर वापस स्रोत पर आना, फिर बाहर की तरफ़ भागना।
हमारे मन में उठ रहे नकारात्मक या सकारात्मक विचार भी तरंगें ही हैं। हमारे मन से उठा हर विचार लौट कर हमारे पास ही आता है- चाहे सकारात्मक, चाहे नकारात्मक। दास्कालोस की अंतर्दृष्टि बिल्कुल आधुनिक विज्ञान की शब्दावली कहती है कि जब भी कोई विचार मन में उठता है तो उसमें एक गति होती है, मोमेन्टम होता है। जब वह विचार लौट कर हमारे मन में वापस आता है तो उसकी गति अपनी मूल गति से सात गुना ज्यादा होती है। जितने बार भी वह लौट-लौट कर हमारे पास वापस आता है उतनी बार उसकी गति अपनी मौलिक गति से सात गुना ज्यादा होती जाती है, वह हमारे मन के गहरे तलों को भेदती है- चेतन से अवचेतन तल, अवचेतन से अचेतन तल, अचेतन से सर्वचेतन तथा सर्वचेतन से अतिचेतन मन के स्तर तक। जब हमारे मन में प्रेम की तरंग उठती है तो वह तरंग भी हमारे पास वापस आती है, हमें पहले से ज़्यादा, गहरा प्रेमपूर्ण बनाती है और जब घृणा की तरंग उठती है तो वह भी लौट कर हमारे पास ही आती है। घृणा की तरंग जिसके लिए उठी उस तक वह तरंग पहुँचे या न पहुँचे लेकिन पहले से सात गुना अधिक गति के साथ हम तक लौट कर ज़रूर आती है।
मायने विश्वविद्यालय (Maine University), अमेरिका के प्रोफ़ेसर काईरियकोस के मार्कडीज़ (Kyriacos C. Markides) ने तीन विस्तृत पुस्तकों में दास्कालोस का प्रमाणिक जीवन विवरण दिया है।
एक बार सारनाथ में ग्यारह दिवसीय प्रवचन श्रंखला में परम पावन दलाई लामा जी बता रहे थे कि असाध्य रोगों से ग्रसित मरीजों के व्यवहार इतिहास, बिहैवियरल हिस्ट्री, का डाक्टरों तथा वैज्ञानिकों ने अध्ययन किया और बड़ा हैरानी वाला निष्कर्ष निकला कि कैंसर, ट्यूमर, पक्षाघात आदि प्राणघातक बीमारियों के अधिकांश मरीज़ अपने व्यवहार इतिहास में घृणा, क्रोध, ईर्ष्या, भय वाले स्वभाव के लोग थे।
यानी हमारे मन में उठे घृणा, क्रोध, ईर्ष्या, प्रतिशोध, भय, कुण्ठा, ग्लानि आदि के विचार अंततः हमें ही बीमार करते हैं। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान भी आज पुख्ता निष्कर्ष पर पहुँच चुका है कि बीमारियों के लक्षण तन पर होते हैं लेकिन उनकी जड़ें मन में होती हैं।
निष्कर्ष यह है कि शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाला भोजन, फल, वनस्पति व दवा का महत्व अपनी जगह है, लेकिन सकारात्मक चिन्तन, मैत्री, करुणा, प्रेम, मुदिता, ध्यान-साधना आदि न केवल आध्यात्मिक बल प्रदान करते हैं बल्कि हमारे शरीर की प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ाते हैं।
भावनात्मक तथा आर्थिक शोषण वाला नकारात्मक पक्ष लगभग हर धार्मिक मत में मौजूद है। लेकिन धर्म का एक सकारात्मक पहलू यह है कि यह इंसान में आशा, विश्वास, श्रद्धा आदि विधायक तत्वों का संचार करता है, जागरण करता है।
भगवान बुद्ध के वचन व बौद्ध आस्था को मनने वाले लोग इस कोरोना महामारी का सामना कैसे करें? कहने की ज़रूरत नहीं चिकित्सकीय विशेषज्ञों तथा तद्नुसार सरकार द्वारा दिये गये निर्देशों का कड़ाई से पालन करें। लेकिन इस महामारी से जनित दहशत का, पैनिकनेस का सामना कैसे करें? भय के विषाणु से, वायरस से, कैसे बचें? भय भी रोग प्रतिरोधक क्षमता को कम करता है।
जैसे, आँधी के समय व्यक्ति मज़बूत आश्रय की शरण लेता है। कोरोना वायरस के चलते पूरे विश्व में भय की आँधी चल रही है। कहाँ शरण ली जाए? क्या करें?
धम्मपद में भगवान बुद्ध के वचन हैं:
कोई भी शरण सभी भय से मुक्त नहीं कर सकती। सिर्फ त्रिशरण समस्त भय से मुक्त कर सकता है- बुद्ध की शरणागति, धम्म की शरणागति, संघ की शरणागति और भगवान बुद्ध के वचन।
बहु वे सरणं तन्ति पब्बतानि वनानि च।। आरामरुक्खचेत्यानि मनुस्सा भयतज्जिता।।188।।
नेतं खो सरणं खेमं नेतं सरणमुत्तमं ।। नेतं सरणामागम्म सब्बदुक्खा पमुच्चति।।189।।
– भयभीत मनुष्य पर्वत, वन, उद्यान, आराम, चैत्य आदि अनेक शरण ग्रहण करते हैं, लेकिन ये कोई भी शरण ग्रहण करके कोई सारे के सारे दुःखों से मुक्त नहीं हो सकता। (धम्मपद बुद्ध वग्गो)
यो च बुद्धञ्च धम्मञ्च संघञ्च सरणं गतो।। चत्तारि अरियसच्चानि समप्पञ्ञाय पस्सति।।190।।
दुक्खं दुक्खसमुप्पादं दुक्खस्स च अतिकम्मं।। अरियञ्चट्ठिङ्गिकं मग्गं दुक्खूपसमगामिनं ।।191।।
एतं खो सरणं खेमं एतं सरणमुत्तमं।। एतं सरणमागम्म सब्बदुक्खा पमुच्चति।।192।।
– जो बुद्ध, धम्म, भगवान बुद्ध के वचन व संघ की शरणागत होता है, चार आर्य सत्यों को प्रज्ञापूर्वक देखता है- दुःख, दुःख का कारण, दुःख का निवारण और निवारण करने का आर्य अष्टांग मार्ग- सिर्फ उसका ही शरणगमन क्षेमपूर्वक है, कल्याणकर है। सिर्फ ये शरण ग्रहण करके ही मनुष्य सारे के सारे दुःखों से मुक्त होता है।
धजग्ग सुत्त में भगवान बुद्ध के वचन हैं:
तुम्हाकं भिक्खवे अरञ्ञगतानं वा उपज्जेय्य भयं वा छम्भितत्तं वा लोमहंसो वा ममेव तस्मिं समये अनुस्सरेयाथ:
भिक्खुओं, यदि वन में, वृक्षमूल में बैठे, शून्यागार में तुम्हें किसी प्रकार का भय, स्तम्भन, रोमांच हो तो उस समय मेरा स्मरण करो:
इतिपि सो भगवा अरहं सम्मासम्बुद्धो विज्जाचरणसम्पन्नो सुगतो लोकविदू अनुत्तरो पुरिसदम्मसारथी सत्था देव मनुस्सानं बुद्धो भगवाति।
भगवान पुनः कहते हैं:
ममंहि वो भिक्खवे अनुस्सरतं यं भविस्सति भयं वा छम्भितत्तं वा लोमहंसो वा सो पहीयिस्सति। नो चे मं अनुस्सरेयाथ। अथ धम्मं अनुस्सरेयाथ:
– मेरा स्मरण करते ही भय, स्तम्भन और रोमांच दूर हो जाएगा। यदि मेरा स्मरण न आए तो धम्म का स्मरण करो:
स्वाक्खातो भगवता धम्मो सन्दिट्ठिको अकालिको एहिपस्सिको ओपनायिको पच्चतं वेदितब्बो विञ्ञूहीति।
भगवान पुनः कहते हैं:
धम्मं हि वो भिक्खवे अनुस्सरतं, यं भविस्सति भयं वा छम्भितत्तं वा लोमहंसो वा सो पहीयिस्सति। नो चे धम्मं अनुस्सरेयाथ, अथ संघं अनुस्सरेयाथ:
– धम्म का स्मरण करते ही भय, स्तम्भन और रोमांच दूर हो जाएगा। यदि धम्म का स्मरण न आए तो संघ का स्मरण करो:
सुपटिपन्नो भगवतो सावक संघो उजुपटिपन्नो भगवतो सावक संघो ञाञपटिपन्नो भगवतो सावक संघो सामीचिपटिपन्नो भगवतो सावक संघो यदिदंचत्तारि पुरिसयुगानि अट्ठपुरिसपुग्गला, एस भगवतो सावक संघो, आहुनेय्यो पाहुन्नेयो दक्खिणेयो अञ्जलिकरणीयो अनुत्तरं पुञ्ञखेत्तं लोकस्साति।
संघ का स्मरण करते ही भय, स्तम्भन और रोमांच दूर हो जाएगा।
बुद्ध, धम्म अथवा संघ का स्मरण करने से भय से प्रहाण क्यों मिलता है? व्यक्ति क्यों निर्भय होता है?
भगवान बुद्ध इस शंका का निवारण करते हुए कहते हैं:
तथागतो भिक्खवे अरहं सम्मासम्बुद्धो वीतरागो वीतदोसो वीतमोहो अभीरु अच्छम्भि अनुत्रासि अपलायीति।
– तथागत अरहत सम्यक सम्बुद्ध वीतरागी हैं, वीतदोषी हैं, वीतमोही हैं, अभीरु हैं, भयरहित हैं, अविचल हैं, अनुत्रासी हैं, दृढ़ हैं।
भगवान के वचनों पर गौर कीजिए कि वे “अभीरु” हैं, भयरहित हैं, निर्भय हैं। जो निर्भय है वही तो निर्भय कर सकता है।
भगवान ने निष्कर्ष दिया:
एवं बुद्धं सरन्तानं धम्मं संघञ्च भिक्खवो। भयं वा छम्भितत्तं वा लोमहंसो न हेस्सतीति।
– भिक्खुओं, बुद्ध, धम्म, संघ के स्मरण से भय, स्तम्भन और रोमांच नहीं होगा।
इस जीवाणु प्रकोप के दौर में एक बौद्ध उपासक, उपासिका की दिनचर्या क्या हो? उसका प्रतिसाद, रिस्पांस क्या हो?
चिकित्सकीय परामर्श व निर्देशों के अनिवार्य पालन के अतिरिक्त प्रतिदिन त्रिरत्न वन्दना करना अर्थात बुद्ध, धम्म, संघ का स्मरण करना। रतन सुत्त, खन्द परित्त, धजग्ग सुत्त, अट्ठवीस परित्त आदि का नियमित पाठ करना तथा आनापानसति ध्यान के साथ मैत्री भावना ध्यान करना।
आनापानसति ध्यान का सरल-सा अर्थ तथा विधि यह कि आती-जाती सांसों का ध्यानपूर्वक अवलोकन करना। जब-जब ध्यान सांसों से भटके उसे पुनः सांसों पर ले आना। ऐसा कम से कम 20 मिनट अनिवार्यतः करना। शुरुआत 5 मिनट से कर सकते हैं।
संक्षेप में मैत्री भावना ध्यान के चार प्रधान चरण हैं तथा समापन के दो उपचरण हैं:
1. स्वयं के प्रति मैत्री:
मन ही मन मौन रूप से स्वयं के प्रति ऐसी मंगलकामनाएं करना, अपने रोम-रोम को इन तथा ऐसी ही भावनाओं से ओतप्रोत कर देना। कम से कम दस मिनट ऐसा करें:
मेरा मंगल हो मेरा कल्याण हो मैं सुखी रहूँ स्वस्थ रहूँ निरोगी रहूँ दीर्घजीवी होऊं आजीवन धम्म के मार्ग पर चलता रहूँ घर, परिवार व संसार के लिए हितकारी तथा सुखकारी बना रहूँ
2. घनिष्ठ मित्रों व परिजनों के प्रति ऐसी ही मंगलकामनाएं करना:
मेरे परिवार का मंगल हो मेरे परिवार कल्याण हो मेरा परिवार सुखी रहे मेरा परिवार स्वस्थ रहे मेरा परिवार निरोगी रहे मेरा परिवार दीर्घजीवी हो मेरा परिवार आजीवन धम्म के मार्ग पर चलता रहे मेरा परिवार घर, परिवार व संसार के लिए हितकारी तथा सुखकारी बना रहे
अपने रोम-रोम को इन तथा ऐसी ही भावनाओं से ओतप्रोत कर देना। कम से कम दस मिनट ऐसा करें। स्थिति, परिस्थिति के अनुसार आप इन शब्दावलियों में अपनी मनोदशानुसार तब्दीली भी कर सकते हैं। मिसाल के तौर आपके घर, परिवार या परिचय परिधि में कोई किसी रोग, शोक से ग्रसित है तो आप उस व्यक्ति का मन ही नाम लेकर भी उसे अपनी मैत्री की तरंगें दे सकते हैं अथवा दे सकती हैं।
3. अजनबी लोगों के प्रति ऐसी ही मंगलकामनाएं।
जैसे, हमारे घर पर अखबार, दूध, सब्जी आदि पहुँचाने व्यक्तियों के प्रति, आज के परिवेश में समस्त डाक्टरों, नर्सों, सफाईकर्मियों, पुलिस, मीडिया कर्मियों आदि के प्रति मैत्री करना व उनके लिए भगवान बुद्ध के वचन का धयान करना।
आपका का मंगल हो आपका कल्याण हो आप सुखी रहें आप स्वस्थ रहें आप निरोगी रहें आप दीर्घजीवी हों आप आजीवन धम्म के मार्ग पर चलते रहें आप घर, परिवार व संसार के लिए हितकारी तथा सुखकारी बने रहें
4. अपने बैरी, आलोचक, विरोधी के प्रति ऐसी ही मंगलकामनाएं करना:
आपका का मंगल हो आपका कल्याण हो आपका सुखी रहें आप स्वस्थ रहें आप निरोगी रहें आप दीर्घजीवी हों आप आजीवन धम्म के मार्ग पर चलते रहें आप घर, परिवार व संसार के लिए हितकारी तथा सुखकारी बने रहें
दरअसल पहले के तीन चरण चौथे चरण की तैयारी हैं। स्वयं के साथ, अपने परिजन व मित्रों के साथ तथा यहाँ तक कि अजनबियों के साथ भी चित्त जब मैत्री से ओतप्रोत हो जाता है तब अपने बैरी के साथ भी मैत्री की जा सकती है। अनुभवी लोग कहते हैं कि शुरुआत में बहुत प्रबल बैरी से मैत्री भावना ध्यान नहीं करना चाहिए। पहले थोड़ा अनबन वाले रिश्तों को लेना चाहिए, फिर क्रमिक रूप से प्रबल से प्रबलतम की ओर पांच-छः महीने के बाद बढ़ना चाहिए।
5. स्वयं के प्रति, मित्र व परिजनों के प्रति, अजनबियों के प्रति तथा अपने बैरी, आलोचक, निन्दक के प्रति एक साथ मंगल मैत्री करना:
सबका का मंगल हो सबका कल्याण हो सब सुखी रहें सब स्वस्थ रहें सब निरोगी रहें सब दीर्घजीवी हों सब आजीवन धम्म के मार्ग पर चलते रहें सब अपने घर, परिवार व संसार के लिए हितकारी तथा सुखकारी बने रहें
6. सब्बे सत्ता सुखी होन्तु सब्बे सत्ता सुखी होन्तु सब्बे सत्ता सुखी होन्तु भवतु सब्ब मंगलम् रक्खन्तु सब्ब देवता भवतु सब्ब मंगलम् रक्खन्तु सब्ब देवता भवतु सब्ब मंगलम् रक्खन्तु सब्ब देवता सब्ब बुद्धानुभावेन धम्मानुभावेन संघानुभावेन सदा सोत्थि भवन्तु ते अभिवादन सीलस्स निच्चंबद्धापिचायिनो चत्तारि धम्मावड्ढन्ति आयुवण्णंसुखंबलं
ऐसी मंगलभावनाओं को मद्धिम स्वर में संगायन करते हुए पूरी धरती और ब्रम्हाण्ड को अपनी मैत्री परिधि में भरते हुए धीरे-धीरे आँखें खोलिये, ध्यान से बाहर आइये।
भगवान बुद्ध के वचन व ध्यान नियमित करने से मैत्री की सिद्धि हो सकती है। फ़िर यह बात चमत्कार नहीं लगेगी कि अंगुलिमाल भगवान बुद्ध के सम्मुख कैसे समर्पित हो गया, पागल हाथी कैसे नतमस्तक हो गया, विषैला नागराज कैसे शान्त हो गया! फ़िर भगवान के वचनों का मर्म सहजता से समझ में आ जाएगा: मैत्री सम्पूर्ण धम्म है!
बेहतर है कि किसी अनुभवी ध्यान आचार्य से आनापानसति तथा मैत्री भावना ध्यान के चरण विधिवत सीख लें।
प्रतिदिन अपने चारो तरफ नज़र दौड़ाइये, देखिये कि कहीं हमारे आसपास किसी को हमारी मदद, सहयोग की ज़रूरत तो नहीं है! सहयोग का हाथ बढ़ाइये। बुद्ध विहारों में पूज्य भिक्खुओं का हालचाल लीजिये कि कोई भोजन रहित तो नहीं रह रहा है।
इस बाध्यकारी लाॅकडाउन अवकाश का सदुपयोग कीजिए। जीवन को ध्यानमय, धम्ममय कीजिए। हवाओं में अपनी मैत्री की तरंगें प्रसारित कीजिए। आप यूँ भी संसार का कल्याण कर सकते हैं। कुशल कर्मों तथा कुशल चिन्तन की श्रंखला बनाइये, कोरोना विस्तार की श्रंखला तोड़िये।
राजेश चंद्रा के फेसबुक वॉल से
