चौदह प्रकार के दान-माता प्रजापति गौतमी और बुद्ध का किस्सा !

मज्झिम निकाय में एक बड़ा प्यारा प्रसंग है- दक्षिणाविभंग सुत्त में। भगवान बुद्ध कपिलवस्तु के न्यग्रोधाराम में विहार कर रहे थे। माता प्रजापति गौतमी भगवान को अर्पित करने के लिए अपने हाथ से काते-बुने दो चीवर लेकर आयीं। ‘संघ को दान’ का महत्व समझते हुए चौदह प्रकार के दान बताए !
ज्ञातव्य है कि सिद्धार्थ गौतम के जन्म के सातवें दिन उनकी माता महामाया दिवंगत हो गयीं थीं। तब उनका लालन-पालन-पोषण उनकी मौसी प्रजापति गौतमी ने ही किया था।
वह भगवान की जननी न सही लेकिन पालक माँ अवश्य थीं। उनके आग्रह पर ही भिक्खुनी संघ की स्थापना हुई थी, वैशाली में।
चीवर अर्पित करते हुए माता प्रजापति गौतमी ने कहा- भगवान, आपको अर्पित करने के लिए ये अपने हाथ से काता-बुना है, कृपया इसे स्वीकार करें!
भगवान ने कहा- गौतमी! इसे संघ को दान कर दो, संघ को दान करने से मैं भी पूजित होउंगा और संघ भी पूजित होगा।
माता प्रजापति गौतमी ने फिर आग्रह किया- भगवान, आपको अर्पित करने के लिए ये अपने हाथ से काता-बुना है, कृपया इसे स्वीकार करें!
भगवान ने पुनः कहा- गौतमी! इसे संघ को दान कर दो, संघ को दान करने से मैं भी पूजित होउंगा और संघ भी पूजित होगा।
तीसरी बार माता प्रजापति गौतमी ने फिर निवेदन किया- भगवान, आपको अर्पित करने के लिए ये अपने हाथ से काता-बुना है, कृपया इसे स्वीकार करें!
तीसरी बार भी भगवान ने कहा- गौतमी! इसे संघ को दान कर दो, संघ को दान करने से मैं भी पूजित होउंगा और संघ भी पूजित होगा।
माता प्रजापति गौतमी को थोड़ा निराश देख कर मान्य आनन्द ने संस्तुति की- भगवान, कृपया प्रजापति गौतमी के चीवरों को स्वीकार करें।
वह आपकी अभिभाविका, पोषिका, क्षीरदायिका (दूध पिलाने वाली) होने से भगवान की उपकारिका हैं!
भगवान भी प्रजापति गौतमी के महोपकारक हैं, भगवान के कारण प्रजापति गौतमी बुद्ध, धम्म, संघ की शरणागत हुईं हैं, शीलधारिका हुईं हैं, बुद्ध-धम्म-संघ के प्रति श्रद्धायुक्त, प्रसादयुक्त हुईं हैं।
भगवान के ही कारण वे दुःख विमुक्त हुईं हैं, दुःखनिरोधगामिनीप्रतिपदा की ज्ञाता हुईं हैं, भगवान भी प्रजापति गौतमी के लिए महोपकारक हैं।
तथागत ने कहा- आनन्द ऐसा ही है।
व्यक्ति व्यक्ति के सहारे ही बुद्ध, धम्म, संघ के शरणागत होता है। लेकिन जो यह अभिवादन, नमन, वन्दन, करबद्ध वन्दना, हाथ जोड़ना, चीवर दान, भोजनदान, शयनासन दान, औषधि दान है, इसे मैं व्यक्ति का उस व्यक्ति के प्रति प्रत्युपकार नहीं कहता।
सच्चा प्रत्युपकार तो पाणातिपातावेरमणि, प्राणीमात्र की हिंसा से विरत होने के मार्ग पर लगना है, अदिन्नदाना वेरमणि, चोरी से विरत होने के मार्ग पर लगना है, कामेसुमिच्छाचारावेरमणि, काम व्यभिचार से विरत होने के मार्ग पर लगना है, मूसावादावेरमणि, मिथ्याभाषण से विरत होने के मार्ग पर लगना है, सुरामेरयमज्ज पमादाट्ठाना वेरमणि, मादक पदार्थों से विरत रहने के मार्ग पर लगना है, दुःखनिरोधगामिनी प्रतिपदा, दुःख निवारण के मार्ग पर लगना है।
आनन्द, चौदह प्रकार के व्यक्तिगत दान होते हैं।
1. बुद्ध को दान देना 2. प्रत्येक बुद्ध को दान देना 3. अरहत को दान देना 4. अरहत मार्गारूढ़ को दान देना 5. अनागामी को दान देना 6. अनागामी मार्गारूढ़ को दान देना 7. सकृतगामी को दान देना 8. सकृतगामी मार्गारूढ़ को दान देना 9. स्रोतापन्न को दान देना 10. स्रोतापन्न मार्गारूढ़ को दान देना 11. वितरागी साधु को दान देना 12. शीलवान साधु को दान देना 13. दुःशील को दान देना 14. तिर्यक योनि को दान देना
आनन्द!
1. तिर्यक योनि को दिये दान का भी सौ गुना फल मिलता है।
2. दुःशील-प्रथग्जन को दिये दान का भी हजार गुना फल मिलता है।
3. शीलवान प्रथग्जन को दिये दान का भी लाख गुना (सौ हजार गुना) फल मिलता है।
4. वीतरागी साधु को दिये दान का भी करोड़ गुना फल मिलता है।
5. लेकिन स्रोतापन्न मार्गारूढ़ को भी दिये दान का परिमाप नहीं है तो फिर स्रोतापन्न, सकृतगामी, अनागामी, अरहत को दिये दान के फल का कहना ही क्या!
प्रथग्जन का तात्पर्य है- जो स्रोतापन्न, सकृतगामी, अनागामी, अरहत इन आध्यात्मिक भूमियों से अभी पृथक बहुत दूर है।
सिर्फ वैराग से भरा है, वितरागी है या शीलसम्पन्न है, शुद्ध शीलाचारी है। ऐसे साधुओं को दिये दान का भी महान फल होता है।
भगवान उनकी भी दान के सुपात्रों में गणना करते हैं।
राग से मुक्त हो जाना एक उच्च अवस्था जरूर है लेकिन उसे भी भगवान ने प्रथग्जन ही कहा है।
जब तक वह स्रोतापन्न के मार्ग पर लग नहीं जाता तब तक पृथक है, शुद्ध शीलवान होना भी ऊँची अवस्था है लेकिन उसे भी भगवान ने प्रथग्जन ही कहा है।
जब तक वह श्रोतापन्न के मार्ग पर लग नहीं जाता तब तक प्रथक है, आध्यात्मिक भूमियों से दूर है। मगर उनकी भी भगवान ने दान के सुपात्रों में गणना की है।
सिर्फ इतना ही नहीं, भगवान की वाणी पूर्णतः पंथनिरपेक्षत है, सेकुलर है।
सिर्फ इतना ही नहीं, भगवान की वाणी पूर्णतः पंथनिरपेक्षत है, सेकुलर है।
वीतरागी साधु, शीलवान साधु के आगे कोई उपसर्ग या पीछे कोई प्रत्यय नहीं संलग्न है कि अमुक पंथ अथवा सम्प्रदाय के साधु को दान देना है। वीतरागी, शीलवान साधु हर मत, पंथ, सम्प्रदाय में होते हैं, कोई बौद्धों में उनका एकाधिकार नहीं है। भगवान कहते हैं कि शीलवान साधु को दिये दान का भी लाख गुना फल होता है और वीतरागी साधु को दिये दान का भी करोड़ गुना फल होता है।
धम्मपद में बुद्ध वचन हैं:
तिणदोसानि खेत्तानि रागदोसा अयं पजा। तस्मा हि वीतदोसेसु दिन्नं होति महप्फलं।।
-खेतों का दोष तृण है, मनुष्यों का दोष है द्वेष। इसलिए द्वेषरहित मनुष्यों को दिये दान का महान फल होता है।
भगवान ने दान देने की खेत में बीज बोने से तुलना की है। जैसे खर-पतवार तृण से भरे खेत में बीज डालने से अच्छी फसल नहीं होती ऐसे ही राग, द्वेष, मोह, इच्छाओं से भरे व्यक्ति को दान देने से महान फल की प्राप्ति नहीं होती। इन दोषों से रहित व्यक्तियों को दान देने से महान फल की प्राप्ति होती है।
मज्झिम निकाय में बारह सुत्तों का पूरा एक विभंग वग्ग है जिसमें सम्बन्धित विषय के एक-एक अंग को विभाजित कर-कर के सुस्पष्ट किया गया है। जैसे सच्चविभंग सुत्त में आर्य सत्यों को अंग-अंग विभाजित कर के समझाया गया है। षडायतनविभंग सुत्त में षड आयतनों को एक-एक कर के विभाजित कर के समझाया गया है।
ऐसे ही भगवान दक्षिणाविभंग सुत्त में दान-दक्षिणा के एक-एक अंग को विभाजित कर के सुस्पष्ट कर रहे हैं।
चौदह प्रकार के व्यक्तिगत दान की महत्ता सुस्पष्ट करने के बाद भगवान सात प्रकार के संघदान को सुस्पष्ट करते हैं।
इतनी बारीकी से समझाने की आवश्यकता क्यों पड़ी?
ताकि माता प्रजापति गौतमी के मन का शंका निवारण हो जाए कि भगवान उनके चीवर स्वयं स्वीकार न करके संघ को दान देने को क्यों प्रेरित कर रहे हैं। यद्यपि उन्होंने पहले ही कहा था- गौतमी! इसे संघ को दान कर दो, संघ को दान करने से मैं भी पूजित होउंगा और संघ भी पूजित होगा।
लेकिन प्रजापति गौतमी के मन की शंका देख कर और आनन्द का आग्रह देख कर भगवान दान के अंग-प्रत्यंग को समझा रहे हैं।
आनन्द! सात प्रकार का संघदान होता है:
1. बुद्ध प्रमुख दोनों संघों को दान देना पहली संघगत दक्षिणा है। (दोनों संघ अर्थात भिक्खु संघ तथा भिक्खुनी संघ दोनों संघ, जिनके प्रमुख भगवान बुद्ध हैं)
2. तथागत के महापरिनिर्वाण के उपरान्त बुद्ध प्रमुख दोनों संघों को दान देना, यह दूसरा संघगत दान है।
3. सिर्फ भिक्खु संघ को दान देना, यह तीसरा संघगत दान है।
4. सिर्फ भिक्खुनी संघ को दान देना, चौथा संघगत दान है।
5. सीमित संख्या में कुछ भिक्खुओं और भिक्खुनियों को दान देना (न कि पूरे संघ को)।
6. सीमित संख्या में भिक्खुओं को दान देना (न कि पूरे भिक्खु संघ को)।
7. सीमित संख्या में भिक्खुनियों को दान देना (न कि पूरे भिक्खुनी संघ को)।
भगवान के अगले वचन भविष्यवाणी भी है और संघदान की महत्ता का वर्णन भी है। भगवान कहते हैं:
आनन्द! भविष्य में सिर्फ भिक्खु नामधारी, काषायमात्रधारी, चीवरमात्रधारी, दुःशील, पापधर्मा भिक्खु भी होंगे।
आनन्द! भविष्य में सिर्फ भिक्खु नामधारी, काषायमात्रधारी, चीवरमात्रधारी, दुःशील, पापधर्मा भिक्खु भी होंगे।
संघ के नाम पर श्रद्धालु उनको भी दान देंगे। आनन्द! उस समय भी संघगत दान को व्यक्तिगत दान से अधिक फल वाला, असंख्य, अपरिमित फल वाला ही कहता हूँ।
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एक तथ्य समझने जैसा है कि संघ चार प्रकार का होता है:
1. भिक्खु अथवा भिक्खुनी संघ 2. महासंघ 3. सांगठनिक संघ 4. आर्य संघ
भिक्खु अथवा भिक्खुनी संघ तो सुस्पष्ट है।
पूरी दुनिया में जितने लोग भी बुद्ध, धम्म, संघ को शरणागत हैं, भिक्खु, भिक्खुनियां, उपासक, उपासिका वे सब महासंघ का अंग हैं।
पश्चिम में आजकल “संलग्न बौद्ध” अथवा “इन्गेज्ड बुद्धिस्ट” शब्दावली बड़ी लोकप्रिय है।
यह शब्दावली विशेषतः उन बौद्धों के लिए है जो घोषित रूप में बौद्ध नहीं हैं लेकिन बुद्ध धम्म के साथ पूरी निष्ठा के साथ संलग्न हैं। ऐसे लोग भी महासंघ का अंग हैं।
सांगठनिक संघ कहते हैं ऐसी संस्था अथवा संगठन को जो त्रिरत्नों को समर्पित हो कर कार्य कर रही है। भारत में लाखों संस्थाएं व संगठन हैं जो त्रिरत्नों को समर्पित हो कर सक्रिय हैं।
वे सब सांगठनिक संघ के अन्तर्गत हैं। समन्वय सेवा संस्थान भी उन्हीं आदर्शों को समर्पित उपासक संघ है। उत्तर भारत में यह सर्वाधिक सक्रिय बौद्ध संघों में से एक है।
और आर्य संघ भगवान बुद्ध सहित अरहतों, प्रत्येक बुद्धों, आठ प्रकार के श्रेष्ठ पुद्गलों का वह अपार्थिव संघ है जो स्थूल रूप में नहीं वरन आध्यात्मिक रूप में सदैव विद्यमान रहता है। जब साधक, श्रद्धालु अकेले में बैठ कर ‘संघं सरणं गच्छामि’ का उच्चारण करता है, जबकि वास्तव में कोई प्रत्यक्ष संघ सामने है नहीं, तब वस्तुतः वह आर्य संघ के प्रति शरणागत होता है।
आर्य संघ हमेशा ही विद्यमान रहता है।
माता प्रजापति गौतमी और आनन्द के मन में दान को लेकर कोई शंका शेष न रह जाए इसलिए भगवान फिर चार प्रकार की दान विशुद्धियां बताते हैं।
आनन्द! दान की चार प्रकार की शुद्धियां होती हैं :
1. कोई दान दायक से परिशुद्ध होता है, प्रतिग्राहक से नहीं।
2. कोई दान प्रतिग्राहक से परिशुद्ध होता है, दायक से नहीं।
3. कोई दान न दायक से परिशुद्ध होता है, न प्रतिग्राहक से।
4. कोई दान दायक से परिशुद्ध होता है, प्रतिग्राहक से भी परिशुद्ध होता है।
1. जब दायक शीलवान, कल्याणधर्मा होता है लेकिन प्रतिग्राहक दुराचारी पापधर्मा होता है तो दान दायक से शुद्ध होता है, प्रतिग्राहक से नहीं।
2. जब दायक दुराचारी, पापधर्मा होता है और प्रतिग्राहक शीलवान, कल्याणधर्मा होता है तब दान प्रतिग्राहक से परिशुद्ध होता है, दायक से नहीं।
3. जब दायक दुराचारी, पापधर्मा होता है और प्रतिग्राहक भी दुराचारी, पापधर्मा होता है तब दान न दायक से परिशुद्ध होता है, न प्रतिग्राहक से।
4. जब दायक शीलवान, कल्याणधर्मा होता है और प्रतिग्राहक भी शीलवान व कल्याणधर्मा होता है तब दान दायक से परिशुद्ध होता है, प्रतिग्राहक से भी परिशुद्ध होता है।
अनेक अट्ठकथाओं में भगवान ने बार-बार आख्यायित किया है कि चार अवसर उपस्थित होने पर दान का फल तत्काल मिलता है। कौन-से चार अवसर?
1. पहला, कि दान देने के लिए सुपात्र मिले, शील-समाधि, प्रज्ञा सम्पन्न व्यक्ति या व्यक्तियों का समूह अर्थात संघ मिले।
2. सुपात्र मिले तो दाता के पास अपनी शुद्ध आजीविका से अर्जित धन, वस्तु, अन्न इत्यादि दान के लिए हो।
3. दान देने के पहले, दान देने के दौरान और दान देने के उपरान्त मन में क्लेश या पछतावा न हो।
4. दाता का दिया दान ग्राही के लिए सुखकारी, हितकारी हो।
भगवान ने बहुविध माता प्रजापति गौतमी को समझाया है कि संघ को दान देना भगवान बुद्ध को दान देने से भी अधिक फलदायी होता है।
भगवान ने बहुविध माता प्रजापति गौतमी को समझाया है कि संघ को दान देना भगवान बुद्ध को दान देने से भी अधिक फलदायी होता है।
आखिरकार, संघ में भगवान बुद्ध हमेशा ही शामिल रहते हैं, क्योंकि समस्त दान बुद्ध के नाम पर ही अर्पित किये जाते हैं। माता प्रजापति गौतमी के महाहित के लिए ही भगवान ने उनके हाथ के बुने चीवर को स्वयं स्वीकार न करके संघ को दान कराया।
अंततः दान प्रथम पारमिता है। दान से धम्म शुरू होता है। दाता को दान का फल मिलता ही है। यह परियत्ति धम्म की शुरुआत है।
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