कोरोना ने कैसे सबको बौद्ध विनय अपनाने पर बाध्य कर दिया ?

।।बौद्ध विनय और कोरोना।। पूज्य भिक्खु धम्मपाल जी संकिसा में प्रवास करते हैं। बहुत विद्वान हैं। पीएचडी किया है। उनके शोध ग्रन्थ पर मैंने भी एक पाठकीय समीक्षा लिखी है।
आज सुबह पूज्य भन्ते धम्मपाल जी का फोन आ गया। अन्य चर्चाओं के बाद कोरोना वायरस पर भी बात होने लगी। भन्ते जी कहने लगे- कोरोना के प्रकोप ने पूरी दुनिया को बौद्ध विनय पालन के लिए बाध्य कर दिया। भगवान बुद्ध के विनय के मुताबिक,
• हाथ नहीं मिलाना है, गले नहीं मिलना है, तीन कदम (लगभग 1 मीटर) दूर से नमस्कार करना है। • उपासक, उपासिकाओं द्वारा भिक्खु, भिक्खुनी को कम से कम तीन कदम दूर से वन्दामि कहना है। पैर नहीं छूना है बल्कि तीन कदम दूर से ही तीन बार पंचांग प्रणाम करना है। • भिक्खु, भिक्खुनी द्वारा पिण्डपात व चारिका के उपरान्त विहार वापस आने पर पहले हाथ-पैर-मुँह धोना है तब विहार में प्रवेश करना है। • पानी को छान कर और उबाल कर पीने के भी विनय हैं। • भोजन सात्विक करना है। • भगवान बुद्ध ने भिक्खुओं को भीड़ और तमाशे से भी दूर रहने के निर्देश दिये हैं, निषेध किया है। • विहार उपासकों की बस्तियों से दूर होना चाहिए। • विहारों की साफ-सफाई के भी बड़े कठोर विनय हैं। बौद्ध देशों में विहारों की सफाई देख कर आप दंग रह जाएंगे।
भन्ते जी ने बौद्ध विनय के बारे में आगे कहा:
“आप देख रहे हैं उपासक जी, भगवान के बनाए जो विनय हैं आज वही निर्देश भारत सरकार और विश्व भर की सरकारें व चिकित्सक जारी कर रहे हैं, कोरोना वायरस से बचाव के लिए! भगवान के दिये विनयों के पालन करने में न केवल वायरस से बचाव है बल्कि बहुत सारे दुःखों व कष्टों से बचाव है।”
एक बात गौर करने लायक है कि कोरोना वायरस का प्रभाव बौद्ध देशों पर कम है लेकिन पश्चिमी देशों पर अथवा पश्चिमी तौर-तरीकों से जीने वालों पर अधिक है। हालांकि इसकी शुरुआत एक बौद्ध देश चीन से ही हुई है लेकिन उस शहर से जिसने मांसाहार की सारी सीमाएं पार कर दी थीं। धम्म तो सार्वभौमिक है न। यह भेदभाव नहीं करता।
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दिसम्बर’2019 में, जब कोरोना वायरस की दूर-दूर तक चर्चा नहीं थी, पूज्य भिक्खु ज्ञानालोक जी के साथ पीजीआई लखनऊ में भर्ती एक मित्र को देखने गये थे तो कक्ष में जाने से पहले भन्ते जी ने अपने मुँह पर मास्क लगा लिया था।
मरीज़ देखने के बाद बताने लगे कि श्रीलंका में सप्ताह में एक दिन भिक्खुगण अस्पतालों में जाते हैं। वहाँ भर्ती मरीजों को मंगलकामनाएं देते हैं, आयु-आरोग्य वर्धन की गाथाओं का पाठ करते हैं। उस समय वे सब अपने मुँह पर मास्क लगाए रहते हैं।
यह तो रहा एक भिक्खु का नज़रिया लेकिन मार्निग वाॅक के समय एक सज्जन इन नयी परिस्थितियों की पृष्ठभूमि में छुआ-छूत की वैज्ञानिकता सिद्ध करने पर तुले हुए थे ।
यह ऋषि-मुनियों ने ऐसा नियम इसीलिए बनाया होगा ताकि विषाणु न फैलें।
कितना बड़ा अन्तर है- भगवान बुद्ध के विनय करूणा व मैत्री फैलाते हैं लेकिन कथित ऋषियों के नियम घृणा फैलाते हैं!
इसी अन्तर को भगवान बुद्ध ने मिथ्यादृष्टि और सम्यक दृष्टि कहा है। वास्तव में संसार के समस्त विवादों की जड़ में सम्यक दृष्टि और मिथ्यादृष्टि का मतभेद ही कारक है।
मैत्री निर्विवाद है। करुणा, दया निर्विवाद है। साफ, सफाई निर्विवाद है। इनका पालन कीजिए तो फिर कोरोना को क्यों रोना ?
राजेश चंद्रा जी की फेसबुक वाल से
