भगवान बुद्ध की प्रतिमा स्थापना और एक संयोग

भगवान बुद्ध की प्रतिमा स्थापना और एक संयोग जिसकी वजह से श्री एम पी गौतम व उनके सम्पूर्ण परिवार को बर्मा के बारह भिक्खुओं का आशीर्वाद प्राप्त हुआ।
समन्वय सेवा संस्थान के तत्वावधान में धम्म गतिविधियों की घटनाएं, इवेन्ट्स, इतनी तेजी से और इतनी ज्यादा हो रही हैं कि बनाएं तो प्रतिदिन एक खबर बनती है लेकिन समयाभाव में ऐसा हो नहीं पाता है फिर भी कुछ गतिविधियाँ रह-रह कर मानस पटल पर कौंधती हैं। इसी बीच एक संयोग बना की श्री एम पी गौतम जी के घर पर बर्मा के बारह भिक्खुओं द्वारा भगवान बुद्ध की प्रतिमा स्थापना में सहभाग कर सका।
श्री एम पी गौतम वन विभाग में जिला वनाधिकारी से भी उच्चतर पद पर सहायक आयुक्त वन हो कर निदेशालय स्तर पर तैनात हैं। धम्म की गतिविधियों में बहुत बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते हैं। वे तथा उनकी श्रीमती जी उर्मिला गौतम संस्थान में धम्मसेवक तथा धम्मसेविका हैं। विगत दिनों वे गोमती नगर, लखनऊ स्थित अपने घर में कुछ सुन्दरीकरण तथा निर्माण करवा रहे थे। भगवान बुद्ध की बड़ी सुन्दर-सी एक प्रतिमा ली थी जिसे वह घर में स्थापित करना चाहते थे। भाभी जी ने एक दिन आग्रह किया- भाई साहब, एक दिन आप आकर देख लीजिए।
समय निकाल कर एक दिन उनके घर गया। प्रतिमा स्थापना के लिए ज़रूरी तैयारी आदि सब तय हो गयी। अब बात आयी कि यह स्थापना होगी किस दिन- भाई साहब, समय आपको ही देना है! जब आप समय देंगे तो चार नाते-रिश्तेदारों को भी आमंत्रित करेंगे।
मैंने कहा- शीशा-मार्बल आदि का काम हो जाने दीजिए, नवम्बर’2019 तक श्रावस्ती में अन्तरराष्ट्रीय भिक्खु संघ के वर्षावास तथा भोजनदान व संघदान के आयोजन भी सम्पन्न हो जाने दीजिए, उसके बाद कोई अनुकूल तिथि तय कर लेंगे, अभी तो हर महीने वहाँ के भोजनदान व संघदान में व्यस्त हूँ।
श्रद्धालु दम्पति बड़ी श्रद्धा-अनुराग से अपने घर में भगवान बुद्ध की प्रतिमा स्थापना की तैयारी में लगे थे। जितनी सुन्दर प्रतिमा थी, जिस तरह से घर की छत पर विहार जैसा स्थान निर्मित करने में वे अच्छे से अच्छा मार्बल, लाइट, शीशा इत्यादि लगवा रहे थे और नाते-रिश्तेदारों को आमंत्रित कर प्रतिमा स्थापना की जैसी योजना उनके मन में थी उसी प्रकार की योजना मेरे मन में चलने लगी कि इस घर में बुद्ध प्रतिमा स्थापना का पूजा संस्कार ऐसा होना चाहिए कि अन्य लोगों के लिए प्रेरणादायक हो। श्रद्धालु दम्पति तथा उनके सुपुत्रों की श्रद्धा व अनुराग से मेरा भी मन मुदित हो रहा था।
मैंने मन ही मन सोचा कि पहले निर्माण कार्य अंतिम रूप ले ले तब उन्हें समय दूं, तब तक श्रावस्ती में वर्षावास कर रहे पावन संघ को भोजनदान तथा संघदान का आयोजन भी सम्पन्न हो चुकेगा।
मगर इस श्रद्धालु दम्पति का पुण्य जागरण ऐसा हुआ कि मेरा मन मुदिता की पराकाष्ठा छू गया।
श्रावस्ती से बर्मा के पूज्य भन्ते पा मोक्खा का संदेश आया कि बर्मा के कुछ भिक्खुगण, लगभग बारह भिक्खु, लखनऊ के दर्शनीय स्थल देखना चाहते हैं, क्या आप तीन-चार दिन के लिए उन सब के रूकने-ठहरने-भोजन तथा लखनऊ भ्रमण आदि की व्यवस्था कर सकते हैं?
मैंने सहर्ष हामी भर ली और बारह भिक्खुओं के लिए लखनऊ में चार दिन ठहरने, भोजन, भ्रमण इत्यादि की व्यवस्था के लिए सम्भावनाएं तलाशने लगा। अक्टूबर के प्रथम सप्ताह में बारह भिक्खुओं के पावन संघ का आना तय हो गया। ठीक उन्हीं तिथियों में लखनऊ में अन्तरराष्ट्रीय स्तर का कोई सरकारी आयोजन होना था जिसके नाते सारे अच्छे होटल पहले से आवंटित थे। कई स्थानों का सर्वेक्षण करने के बाद मैंने मित्र भवननाथ पासवान जी को फ़ोन किया। उनसे पूछा नहीं, सीधे अपनत्व वाले आदेश की भाषा में कहा- बर्मा के बारह भिक्खुओं का पावन संघ लखनऊ पधारने को है, उनके ठहरने के लिए मुझे चार दिन के लिए आपका कार्यालय चाहिए ।
उन्होंने बेहिचक कह दिया- कार्यालय आपका है, जब चाहें ले लें।
उनका कार्यालय दरअसल पूरा एक फ्लैट है जिसके सब कमरों में गद्दे बिछा दिये जाएँ तो दस-बारह लोग आराम से रुक सकते हैं। टेण्ट हाउस से गद्दे-तकियों व कम्बलों की बात हो गयी। चार दिन नाश्ते-भोजन के लिए होटल से बात हो गयी। श्री महेश सत्यार्थी जी मेरे साथ-साथ थे। सारी व्यवस्था हो जाने के बाद फिर मेरे मन में लहर आयी- ये व्यवस्था पावन संघ की गरिमा के अनुरूप नहीं है, मगर किया क्या जाए, कोई विकल्प भी दिख नहीं रहा था।
शायद कोई सरकारी गेस्ट हाउस मिल जाए, इस प्रत्याशा में अंततः मैंने श्री एम पी गौतम जी को ही फोन कर दिया। उन्हें सारी परिस्थिति से अवगत कराया। वे हमेशा ही मेरी चिन्ता को अपनी चिन्ता बना लेते हैं। पूरी बात सुन कर उन्होंने कहा- मैं आपको शाम तक बताता हूँ।
मुझे उम्मीद बंध गयी कि शायद कोई गेस्ट हाउस मिल जाएगा। अगले दिन उनका फोन आया- सर, यह बताइये कि वह संघ क्या हमारे घर पर रुक सकता है? मैंने उपासिका जी से बात कर ली है।
यह सवाल सुनते ही मेरा मन मुदिता की पराकाष्ठा छू गया। मैंने मन ही मन कहा- इस श्रद्धालु दम्पति का पुण्य जाग गया है!
मन की बात मन में ही रखी और कहा- सर, इससे अच्छी बात क्या हो सकती है!
यह सुनते ही उन्होंने मुदित मन से कहा- लीजिये, आप उपासिका जी से बात कर लीजिये!
यह कह कर उन्होंने फोन भाभी जी को दे दिया। बड़े मुदित मन से उन्होंने पूछा- भाई साहब, क्या-क्या तैयारी करनी पड़ेगी?
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मैंने कहा- मेहमानों को ठहराने के लिए जो कुछ करते हैं वह सब कुछ कीजिए, लेकिन सबसे बड़ा काम यह करिये कि घर की छत पर भगवान की प्रतिमा स्थापना का जो काम चल रहा है उसे तुरन्त अंतिम रूप दीजिए, पावन संघ के द्वारा ही प्रतिमा स्थापना की पूजा भी हो जाएगी, इससे अच्छा अवसर नहीं मिलेगा।
भाभी जी हिचकिचायीं, कहने लगीं- भाई साहब, अभी तो उसमें बहुत काम बचा है…
मैंने पुनः बलपूर्वक आग्रह किया- किसी भी तरह आप इस काम को संघ के आगमन से पूर्व पूरा कराइये, यह दुर्लभ अवसर घर चल कर आ गया है!
और उस दिन से श्रद्धालु दम्पति तैयारी में लग गये। दिन प्रतिदिन जरूरी तैयारियों की बातें होती रहीं, एक दिन घर जा कर पूरी तैयारी देखी।
इस बीच भगवान बुद्ध की प्रतिमा स्थापना के बारे में पूज्य भन्ते पा मोक्खा जी से पूरे कार्यक्रम की रूपरेखा पर चर्चा की। संघ के लखनऊ दर्शन के कार्यक्रम के अलावा अन्य धम्म अनुष्ठानों के लिए वे सहर्ष तैयार हो गये और तदनुरूप परित्त पाठ का आयोजन 7 अक्टूबर’2019 को एम पी गौतम जी के आवास पर तय हो गया और श्रद्धालु दम्पति तन-मन-धन से, मन-वचन-कर्म से उस तैयारी में लग गये। बर्मा के पावन संघ द्वारा एम पी गौतम जी-उर्मिला गौतम जी के घर पर भगवान बुद्ध की प्रतिमा स्थापना तथा परित्त पाठ का अभूतपूर्व आयोजन हुआ। इस अवसर पर श्री एम पी गौतम जी ने अपने नाते-रिश्तेदारों व मित्रों, परिजनों को भी आमंत्रित किया, प्रीति भोज की भी व्यवस्था की।
यह आयोजन इस मायने में अनूठा रहा कि जो बौद्ध परम्पराएं भारत से लुप्त हो गयीं हैं उन्हें उनके मूल रूप में धम्म के मर्मज्ञों द्वारा सम्पादित होते हुए देखना- प्रतिमा स्थापना, तत्समय की पूजा-वन्दना, परित्त पाठ के चयनित सुत्त, उनका क्रम इत्यादि सब कुछ मन में श्रद्धातिरेक जगा रहा था और विस्मित, मुदित भी कर रहा था।
समस्त बौद्ध संस्कार पूज्य भन्ते डा. पंदावंसा के नायकत्व में हुआ जो कि बर्मा के एक बौद्ध विश्वविद्यालय में उस स्तर के संस्थापक प्रोफेसर हैं जिसे भारत में वाइस चांसलर, कुलपति कहते हैं। वे अभिधम्म के विशेषज्ञ हैं।
श्रद्धालु दम्पति ने सपरिवार चार दिनों तक पावन संघ की विशिष्ट अतिथि के जैसी सेवा की, चार दिन के लिए उनका भव्य घर बुद्ध विहार बन गया था। पति-पत्नी, बेटे सब लोग मिल कर पावन संघ की छोटी-बड़ी सब आवश्यकताओं को तत्परता से सहर्ष पूरा करने में व्यस्त थे। बाबा साहेब डा. अम्बेडकर स्मारक, शान्ति उपवन बुद्ध विहार, परिवर्तन चौक इत्यादि लखनऊ के दर्शनीय स्थलों को दिखाने का दायित्व हमने निभाया।
महामंगल सुत्त में भगवान बुद्ध के वचन हैं- पुब्बे च कतपुञ्ञता…एतं मंगलमुत्तमं… पूर्व के संचित पुण्य कर्मों का होना…यह उत्तम मंगल है…
परित्त पाठ और प्रतिमा स्थापना का जैसा दिव्य आयोजन इस परिवार में हुआ वैसा अपनी कल्पना में भी नहीं था। यह परिवार मेरा आभार मानता है और हम उनका आभार मानते हैं। यह जो परस्पर आभार की अनुभूति है यही मैत्री है!
कुछ ऐसा ही प्रसंग श्री अमृत प्रकाश जी-श्रीमती शीलू प्रकाश के के साथ हुआ। समय मिला तो वह प्रसंग फिर कभी!



