संत गाडगे महाराज, बाबा साहब डॉ अम्बेडकर के जीवन्त गुरु

बोधिसत्व बाबा साहेब डा अम्बेडकर तीन लोगों को अपना गुरु मानते थे- भगवान बुद्ध, संत कबीर और महात्मा ज्योतिबा फूले को। बाबा साहेब का परिवार कबीरपंथी था ही इस नाते संत कबीर के प्रति उनके मन में सहज श्रद्धा थी। कालान्तर में संत कबीर को उन्होंने अपना गुरू मान लिया इसके साथ ही वह संत गाडगे महाराज से भी बहुत अधिक प्रभावित थे।
समय के अन्तराल में जैसे-जैसे बाबा साहेब का अध्ययन व्यापक हुआ तब वे कहने लगे कि मैंने शून्य से काम करना नहीं शुरू किया, शून्य से काम शुरू किया था महात्मा ज्योतिबा फूले ने, मैंने उनके आगे काम करना शुरू किया है। और अन्ततः महात्मा ज्योतिबा फूले को वे अपना दूसरा गुरू मानने लगे।तीसरा गुरु वे भगवान बुद्ध को मानते थे और आखिरकार अपने लाखों अनुयायियों के साथ उन्होंने बुद्ध का धम्म अंगीकार कर लिया।
बाबा साहेब प्रकाण्ड विद्वान थे, शिखर के बौद्धिक, इंटेलेक्चुअल, थे लेकिन करुणा की पराकाष्ठा तक भावुक भी थे और सिरे के श्रद्धालु थे लेकिन जीवन भर उन्हें कोई जीवन्त व्यक्तित्व ऐसा नहीं मिला जिसे वह अपना गुरू मानें। जिनको उन्होंने अपना गुरू माना- भगवान बुद्ध, संत कबीर और महात्मा ज्योतिबा फूले- वे स्थूल शरीर में विद्यमान नहीं थे। इतिहास के इन तीन महान व्यक्तित्वों को बाबा साहेब ने अपने ह्रदय में गुरुवत धारण कर लिया, जो स्थूल काया में विद्यमान नहीं थे, लेकिन एक स्थूल शरीरधारी गुरू की हसरत बाबा साहेब के मन निरन्तर बनी रही। और वह हसरत पूरी हुई जब बाबा साहेब ने महान संत गाडगे महाराज के दर्शन किये। यूँ प्रकट रूप से बाबा साहेब और संत गाडगे महाराज ने कभी एक दूसरे को गुरू-शिष्य के रूप में घोषित नहीं किया लेकिन दोनों के बीच जैसी प्रीत दिखती है वह गुरु शिष्य जैसी ही है।
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बाबा साहेब के जीवन में एकमात्र व्यक्ति संत गाडगे महाराज थे जिनको बाबा साहेब का जीवन्त गुरु कहा जा सकता है। बाबा साहेब ने पहली बार 12 जुलाई सन् 1949 को पण्डरपुर में संत गाडगे महाराज के दर्शन किये। इस अवसर पर गाडगे बाबा ने बाबा साहेब का सार्वजनिक अभिनन्दन किया और उन्हें मराठी अभंग सुनाए।
बोधिसत्व बाबा साहेब संत गाडगे महाराज के सामाजिक आन्दोलन से अत्यन्त प्रभावित थे और दोनों महापुरुषों के कई-कई बार मुलाकातों के विवरण अभिलिखित भी मिलते हैं तथा सुनने को भी मिलते हैं। स्वयं संत गाडगे महाराज ने कई-कई अवसरों पर बाबा साहेब का महान अनुमोदन किया तथा सार्वजनिक अभिनन्दन किया। रजक अथवा श्रीवास या कि कन्नौजिया समाज महाराष्ट्र में अन्य पिछड़ा वर्ग के अन्तर्गत आता है। संत गाडगे महाराज इसी समाज से थे लेकिन उनके अनुयायी सभी वर्गों से थे।
पण्डरपुर महाराष्ट्र का सर्वाधिक मान्यता वाला तीर्थ है जहाँ संत ज्ञानेश्वर की समाधि, आलन्दी से प्रतिवर्ष वारि आती है जिसमें लाखों श्रद्धालु पैदल पण्डरपुर आते हैं। वहाँ अछूतों के ठहरने की कोई उचित व्यवस्था नहीं थी। संत गाडगे महाराज ने वहाँ एक धर्मशाला अछूतों के लिए बनवायी थी। रोचक बात यह है कि गाडगे बाबा पण्डरपुर में रहते थे लेकिन विट्ठल के दर्शन नहीं करते थे मगर आने वाले श्रद्धालुओं के लिए झाड़ू हाथ में लेकर अपने शिष्यों के साथ मार्ग साफ करते रहते थे। बाबा के अनुयायियों की संख्या लाखों में थी। उनकी बनवायी धर्मशाला में सभी जाति-वर्ग के लोग बिना भेदभाव के ठहराए जाते थे।वह धर्मशाला संत गाडगे महाराज ने सार्वजनिक रूप से बाबा साहेब को सामाजिक प्रकल्पों के लिए पीपुल एजुकेशन सोसाइटी को समर्पित कर दी। इस अवसर का एक प्रसंग बड़ा प्रसिद्ध है:
पण्डरपुर में अपने हजारों अनुयायियों के सामने उन्होंने अपने हजारों शिष्यों से पूछा- तुमने भगवान के दर्शन किये हैं क्या?
सारे श्रद्धालुओं ने हाथ उठा कर कहा- नहीं
तब गाडगे महाराज ने पूछा- तुम लोगों को भगवत्दर्शन करना है क्या?
सारे श्रद्धालुओं ने एक स्वर में हामी भरी, तब बाबा गाडगे ने बाबा साहेब के कन्धे पर हाथ रखकर अपने श्रद्धालु अनुयायियों से कहा- यह तुम्हारा भगवान है, तुम्हारे उद्धार के लिए आया है…
यह बहुत बड़ी साहसिक व क्रान्तिकारी बात थी। भरी सभा में एक संत ने बाबा साहेब को श्रद्धा के शिखर पर आसीन कर दिया। और बाबा साहेब का कथन है कि महात्मा ज्योतिबा फूले के बाद भारतीय इतिहास में गाडगे बाबा महानतम संत हैं। डा विमलकीर्ति रचित संत गाडगे महाराज की एक सचित्र जीवनी सम्यक प्रकाशन ने प्रकाशित की है जिसमें बाबा के जीवन को संक्षेप में लेकिन सारगर्भित स्वरूप में प्रस्तुत किया है।
डा विमलकीर्ति लिखते हैं “गाडगे बाबा के अपने समकालीन कई नेताओं से किसी न किसी रूप में अच्छे सम्बन्ध थे। लेकिन उनके डा बाबा साहेब अम्बेडकर के साथ जितने अच्छे सम्बन्ध थे, वैसे सम्बन्ध अन्य किसी नेता से नहीं थे। गाडगे बाबा और डा अम्बेडकर एक दूसरे से कई बार मिले थे। उन दोनों में सुसंवाद भी हुआ था। डा अम्बेडकर गाडगे बाबा के कार्यों के प्रशंसक थे, वैसे ही गाडगे बाबा भी डा अम्बेडकर के कार्यों के प्रशंसक थे। गाडगे बाबा ने पण्डरपुर की धर्मशाला, जो अछूतों के लिए बनायी थी, डा अम्बेडकर के अधीन कर दी थी।”
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उसी पुस्तक में डा विमलकीर्ति जिक्र करते हैं “गाडगे बाबा दादर में डा महाजनी के यहाँ बीमार अवस्था में थे। महानन्दसामी ने बाबा के बीमार होने की खबर डा अम्बेडकर को दी। डा अम्बेडकर उस समय भारत के कानून मंत्री थे। उनको शाम को ही दिल्ली जाना था। कुछ ही समय में उनको स्टेशन पहुँचना था, ट्रेन के लिए ज्यादा देर नहीं थी। लेकिन बाबा की बीमारी की खबर मिलते ही डा अम्बेडकर खड़े हो गये और कहा, “तो फिर मुझे उनके दर्शन करने ही चाहिए।” और उन्होंने दो कम्बल साथ में लिये और महानन्दसामी के साथ वे डा महाजनी के घर गये। जैसे ही उनको पता चला कि डा अम्बेडकर आए हैं, बाबा बिस्तर से उठ कर बैठ गये और बोले, ” आप क्यों आए? आपका एक-एक मिनट बड़ा कीमती है। हम फ़कीर हैं। आपका कितना बड़ा अधिकार है।” डा अम्बेडकर बोले, ” बाबा, हमारा अधिकार दो दिन का है। कल कुर्सी से हटे तो हमें कौन पूछने वाला है? आपका अधिकार अमर है।” उस समय कर्मवीर भाऊराव पाटील, दिवान बहादुर जगताप भी बाबा से मिले थे। इन सभी के सामने बाबा ने पण्डरपुर की धर्मशाला डा अम्बेडकर को सौंपी।”
बुद्ध धम्म स्वीकार करने का अपने जीवन का सबसे अहम फैसला लेते समय भी बाबा साहेब ने संत गाडगे महाराज से गहन मंत्रणा की। डा विमलकीर्ति ने ही उल्लेख किया है: “गाडगे बाबा मुम्बई के जे जे हास्पिटल के पास की धर्मशाला में चल रहे स्कूल की देखभाल कर रहे थे। डा. अम्बेडकर ने उनके पास अपने एक दूत को भेजा। डा. अम्बेडकर गाडगे बाबा से धर्मान्तरण के बारे में चर्चा करना चाहते थे। बाबा तुरन्त कुलाबा में डा अम्बेडकर से मिलने को गये। इस सम्बन्ध में गाडगे बाबा ने डा अम्बेडकर से बड़े विस्तार से बात की।”
इस अवसर पर बाबा साहेब ने बाबा गाडगे को अवगत कराया “बाबा, मैं सभी दलितों को लेकर बुद्ध की शरण में जाऊंगा। नागपुर में यह समारम्भ होने वाला है। हमें आपका आशीर्वाद चाहिए।” गाडगे बाबा ने डा अम्बेडकर के कार्य की मंगलकामना की और नमस्कार कर वहाँ से चले गये।
संत गाडगे महाराज के पौत्र श्री हरिनारायण सुखदेव राव जानोरकर ने बताया कि बाबा गाडगे स्वयं दीक्षा समारोह में अपने लाखों अनुयायियों के साथ सम्मिलित होना चाहते थे लेकिन स्वास्थ्य शिथिल होने के कारण वे इस ऐतिहासिक घटना में शामिल नहीं हो सके थे, मगर उनका पूरा आशीर्वाद बाबा साहेब के साथ था। गाडगे बाबा बोधिसत्व बाबा साहेब से उम्र में पन्द्रह साल बड़े थे। गाडगे बाबा के पास अक्षर ज्ञान नहीं था लेकिन जो ज्ञान था वह अक्षर था।
श्री हरिनारायण सुखदेव राव जानोरकर जी बताते हैं कि गाडगे बाबा को बाबा साहेब ने पूर्व में भी एक अवसर पर अवगत कराया था कि उन्होंने छुआ-छूत के धर्म को त्याग देने का निर्णय लिया है तब गाडगे बाबा ने एक महत्वपूर्ण बात कही थी- बाबा साहेब, मुझे विश्वास है कि आप जो भी निर्णय लेंगे वह भारत के अछूत व पिछड़े वर्गों के हित में होगा, मेरा बस एक सुझाव है कि जो भी धर्म चुनियेगा भारतीय मूल का चुनियेगा, इससे भारतीयता सुरक्षित रहेगी।” कहने की आवश्यकता नहीं कि बुद्ध धम्म स्वीकार कर बोधिसत्व बाबा साहेब ने न केवल राष्ट्र का गौरव बढ़ाया बल्कि राष्ट्रीयता को सुरक्षित भी किया।
6 दिसम्बर’1956 को बोधिसत्व बाबा साहेब के परिनिर्वाण की खबर सुन कर गाडगे बाबा अत्यन्त व्यथित हो गये और उन्होंने उस दिन से भोजन छोड़ दिया तथा मात्र चौदह दिन के बाद 20 दिसम्बर’1956 को संत गाडगे महाराज ने भी शरीर छोड़ दिया।
बाबा गाडगे के सम्मान में महाराष्ट्र सरकार ने जिला अमरावती में वर्ष 1983 में ‘संत गाडगे महाराज विश्वविद्यालय’ की स्थापना की। भारत सरकार ने उनकी स्मृति में 20 दिसम्बर’1998 को एक डाक टिकट जारी किया तथा वर्ष 2001 से महाराष्ट्र सरकार ने ‘संत गाडगे बाबा ग्राम स्वच्छता अभियान’ शुरू किया। उत्तर भारत एवं उत्तर भारत का कन्नौजिया समाज, रजक समाज, श्रीवास समाज अभी संत गाडगे महाराज के जीवन परिचय एवं उनकी महानता से लगभग अनभिज्ञ-सा है। समय आ गया है कि संत गाडगे महाराज के अधूरे सपनों को समाज पूरा करे। वे आधुनिक युग में स्वच्छता अभियान के जनक हैं। महाराष्ट्र में सरकारी तौर पर गाडगे महाराज के नाम पर स्वच्छता के अनेक प्रकल्प, परियोजनाएं, प्रोजेक्ट हैं जबकि यह अभियान राष्ट्रीय स्तर पर होने चाहिए।
