Dream Come True: ख़्वाब की ताबीर (एक सपना जो सच हो गया)

Dream Come True: यह मेरे लिए यकीन कर पाना बिलकुल असंभव था कि मेरा देखा हुआ सपना पूर्ण रूप से और उन्ही पात्रों के साथ पूरा हो चुका है। और साथ ही मुझे इस बात कि खुशी भी है कि मुझे और मेरे परिवार को उनका आशीर्वाद भी प्राप्त हो चुका है
उर्दू ज़बान में एक लफ्ज़ है- मोजज़ा, जिसका अर्थ कुछ करामात या करिश्मा जैसा होता है।
अगर कोई रूहानी-सा सपना आए, जो हमारे तार्किक मन की सरहदों के पार हो, तो उसे मोजज़ा कहते हैं। और अगर वह सपना सच हो जाए तो उसे कहते हैं- ख़्वाब की ताबीर होना, यानी सपने का सच हो जाना, हिन्दी में कहें तो कहना होगा- स्वप्न का साकार हो जाना।
यूँ स्वप्न साकार होना एक मुहावरा जैसा भी है लेकिन यहाँ जिस सन्दर्भ में ज़िक्र कर रहा हूँ वह मोजज़ा है। अगर किसी इस्लामी श्रद्धालु को रात सपने में काबा दिख जाए या कोई मज़ार या दरगाह सपने में दिख जाए तो सुबह बड़ी खुशनुमा आवाज़ में वह कुछ यूँ सपना बयान करेगा- आज रात एक मोजज़ा हुआ…
कोई ऐसा सपना देखे, जैसे किसी दोस्त या रिश्तेदार को सपने में देखे और उसी रोज़ वह सच में घर आ भी जाए, तो कहा जाएगा कि ख़्वाब की ताबीर हो गयी।
सपनों और उनकी व्याख्याओं के अनेकानेक प्रसिद्ध प्रसंग हैं- धार्मिक क्षेत्र में, ऐतिहासिक क्षेत्र में और वैज्ञानिक क्षेत्र में भी। कैकुले का बेन्जीन के सूत्र व संरचना का स्वप्न रसायन शास्त्र की पुस्तकों में दर्ज है। सिद्धार्थ के जन्म के पहले माता महामाया को भी कुछ अनूठे सपने आए थे।
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दरअसल सपने कुदरत की भाषा है। स्वप्न व्याख्या परामनोविज्ञान, पैरासाइकाॅलाजी, का उच्चतम विषय है। दरअसल यह अवचेतन का विज्ञान है। इस विषय पर सर्वाधिक सुव्यवस्थित अध्ययन व शोध सिगमंड फ्रायड, कार्ल गुस्ताव जुंग, अब्राहम मैस्लोव ने किया है और हाल के बरसों डा. ब्रायन वेस का काम बड़ा वैज्ञानिक है।
खैर, मुझे भी एक मोजज़ा हुआ
एक सुबह भोर में सपना देखा कि मेरे घर पर बर्मा से चार भिक्खु आए हैं, साथ में दो उपासक भी हैं। सपने में घर पुराना वाला दिखाई दिया जिसके आंगन में गूलर का पेड़ लगा था। आंगन में पके गूलर और उसके पत्ते पड़े रहते थे। वे भिक्खु बिल्कुल सुबह-सुबह आ गये हैं, इतनी सुबह कि अभी आंगन में झाड़ू भी नहीं लगी है।
पके गूलर और पत्ते आंगन में पड़े हुए हैं। ऐसे पूजनीय भन्ते जी को अचानक घर पर पा कर प्रसन्नता तो अपार हो रही थी लेकिन मन असहज था कि अभी घर की साफ-सफाई भी हुई नहीं है। मेरे मन की असहजता को अन्तर्यामी भन्ते जी ने जान लिया और कहा- उपासक जी, परेशान होने की ज़रूरत नहीं है…
यह कहने के बाद पूज्य भन्ते जी ने पूजा की, कुछ सुत्त पाठ किये, घर के सभी सदस्यों के सिर पर हाथ रख आशीर्वाद दिया। फिर वरिष्ठतम भन्ते जी ने घर के आंगन से चुटकी भर मिट्टी उठायी और मेंरे माथे पर लगाया जैसे कि तिलक लगा रहे हों! और मेंरे पूरे बदन में जैसे विद्युत की धारा-सी दौड़ गयी, शक्ति व आनन्द की सिहरन से पूरा शरीर कंपित हो गया!
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बस उसी कंपन से मेरी आंख खुल गयी। इस सपने की आवृत्ति में इतनी तीव्रता थी कि जागने के काफ़ी देर बात तक मैं इस दिव्य दृश्य के प्रभाव में रहा। जाग गया हूँ, यह सच ही मुझे सपना लगता रहा और सपना आंखों के सामने चैतन्य खड़ा था। बार-बार मन में एक ही लहर उठती रही- यह साधारण सपना नहीं है, कोई गहरा संकेत है, किसी दिव्य सत्ता ने आशीष दिया है…
सारा दिन ऐसा ही कुछ चिन्तन चलता रहा, रह-रह कर मन के पटल पर भन्ते जी के द्वारा मेरे माथे पर तिलक करने का दृश्य सिहरन पैदा करता रहा…मन हैरान होता रहा- बर्मा के भन्ते!
और हैरानी अपने चरम पर पहुँच गयी जब शाम होते मेरे पास बर्मा के एक भन्ते जी का ईमेल आया- पूज्य भन्ते पा मोक्खा का। मालूम हुआ कि उड़ान से वह लखनऊ आ रहे हैं। उन्हें श्रावस्ती जाना है। मैंने उन्हें आश्वस्त किया कि एयरपोर्ट पर मिलूँगा। उड़ान सुबह 10:35 पर पहुँचनी थी। मन में योजना ऐसे बना लिया कि भन्ते जी से एयरपोर्ट पर मिलूँगा तथा स्वागत-सत्कार की औपचारिकता पूरी करके श्रावस्ती के लिए विदा कर दूँगा।
एक सुबह स्नान करते समय मेरे मन में प्रेरणा हुई कि भन्ते जी से निवेदन करूँ कि पहले मेरे घर पर भोजनदान स्वीकार कर लें फिर श्रावस्ती के लिए प्रस्थान करें। मैंने अपनी संगिनी और बेटे से राय-मशविरा किया। वो सहज व सहर्ष तैयार हो गये। फिर भी मेरे मन में आशंका ने सिर उठाया कि पता नहीं भन्ते जी प्रस्ताव स्वीकार करेंगे कि नहीं।
उनका अपना निर्धारित कार्यक्रम क्या है, यह भी मालूम नहीं है। बड़े हिचकते हुए मैंने अपने प्रस्ताव से सम्बन्धित ईमेल किया। यह निवेदन भी किया कि कम से कम एक दिन सेवा का अवसर दें, यहीं रुकें। मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा कि लौटती ईमेल से भन्ते जी का सकारात्मक जवाब आया कि वे भोजनदान के लिए तैयार हैं, लेकिन भोजनदान के तुरंत बाद श्रावस्ती के लिए प्रस्थान करेंगे, रुकेंगे नहीं ।
साथ में उन्होंने यह भी सूचित किया कि वे अकेले नहीं हैं। स्वयं को मिलाकर वे चार भन्ते हैं और दो उपासक हैं। यह सुनते ही मेरी मन की आँखों के सामने सपने का पूरा दृश्य तैर गया। मैं सोचने लगा कि कहीं क़ायनात में तैरती कोई घटना का पूर्वदर्शन तो नहीं हो गया था!
निर्धारित तिथि व समय पर चार भन्ते और दो उपासक घर आए। भोजनदान का पुण्य लाभ मिला। और पूरा घटनाक्रम लगभग वैसा ही हुआ जैसा सपने में देखा था। पूज्य भिक्खु संघ ने घर पर बुद्ध पूजा की, मेत्तानिसंस सुत्त का पाठ किया और पूरे परिवार को आशीर्वाद दिया।
भन्ते जी से मैंने सपने की बात का जिक्र नहीं किया, लेकिन मन अभी तक हैरान है…यह मोजज़ा हुआ, ख़्वाब की ताबीर हुई!
हालांकि ऐसी अनुभूतियों को सार्वजनिक उद्घाटित करना उचित नहीं होता लेकिन बड़ी हिम्मत करके आज एक मर्यादा उल्लंघन कर दिया। ध्यान व स्वप्न की अनुभूतियों का संग्रह तैयार करूँ तो पूरी पुस्तक बन सकती है।
उस लम्हे की खूबसूरत तस्वीरें –
राजेश चन्द्रा जी की फेसबुक वाल से



