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आज पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का जन्मदिन है, जिन्होंने भारतीय राजनीति में सुनहरा अध्याय लिखा!

मनमोहन सिंह(Dr. Manmohan Singh) का आज 89वाँ जन्मदिन है, वो जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी के बाद सबसे ज़्यादा समय तक भारत के प्रधानमंत्री रहे हैं। आइये याद करें नरसिम्हा राव और मनमोहन सिंह की उस जोड़ी को और जानें कुछ अन्य बातें हमारे पूर्व प्रधानमंत्री के बारें में।

मनमोहन सिंह ने पहली बार 2004 में और फिर 2009 में दोबारा कांग्रेस की अगुआई वाली गठबंधन सरकार का नेतृत्व किया।

भारतीय राजनीति को एक सुनहरी दिशा देने वाले प्रधानमंत्री थे मनमोहन सिंह(Dr. Manmohan Singh)

मनरेगा के जनक मनमोहन

मनरेगा के लिए कांग्रेस की आज भी प्रशंसा होती है। प्रधानमंत्री पद पर रहते हुए मनमोहन सिंह मनरेगा यानी महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MNREGA) लेकर आए। ऐसा माना जाता है कि 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के लिए यह योजना संजीवनी साबित हुई।

बेरोजगारी से जूझते देश में यह योजना काफी लाभदायक साबित हुई। योजना के तहत साल में 100 दिन के रोजगार की गारंटी देने वाला यह योजना काफी हद तक सफल हुई। खास बात यह भी है कि इसके तहत पुरुषों और महिलाओं के बीच किसी भी तरह के भेदभाव की अनुमति नहीं है।

आर्थिक उदारीकरण की नीति के जनक –

डॉ. मनमोहन सिंह का जिक्र आते ही लोगों को 90 का वो दौर याद आता है, है जब मनमोहन सिंह और नरसिम्हा राव की जोड़ी ने नई उदारीकरण की नीति लाकर देश की अर्थव्यवस्था को एक नया आयाम दिया था।

देश आर्थिक मोर्चे पर पिछड़ा था। उस वक्त वित्त मंत्री रहे मनमोहन सिंह ही न्यू इकॉनोमिक पॉलिसी यानी आर्थिक उदारीकरण की रूपरेखा लेकर आए।

भारतीय अर्थव्यवस्था को विश्व बाजार से जोड़ने के बाद उन्होंने आयात और निर्यात के नियम भी सरल किए। इससे लाइसेंस और परमिट गुजरे वक्त की बात होकर रह गई। घाटे में चलने वाले पीएसयू के लिए अलग से नीतियां बनाईं और अर्थव्यवस्था पटरी पर लौटी।

बिना शिक्षक कैसे साकार होगी भारत को विश्वगुरू बनाने की परिकल्पना?

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शिक्षा का अधिकार कानून मनमोहन(Dr. Manmohan Singh) की देन-

डॉ. मनमोहन सिंह के कार्यकाल में ही राइट टू एजुकेशन यानी शिक्षा का अधिकार 2009 अस्तित्व में आया। RTE के तहत 6 से 14 साल के बच्चे को नि: शुल्क शिक्षा का अधिकार सुनिश्चित किया गया। कहा गया कि इस उम्र के बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा दी ही जाएगी। यह योजना भी बदलाव का वाहक बनी। तमाम विशेषज्ञों ने इसकी तारीफ की।

आधार लाने वाले मनमोहन सिंह(Dr. Manmohan Singh)–

भारत में आधार कार्ड योजना लाने का श्रेय पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को जाता है। पूर्व पीएम मनमोहन सिंह (Dr. Manmohan Singh) ने साल 2010 में इस योजना को लेकर आए। देश के हर व्यक्ति को पहचान देने और प्राथमिक तौर पर प्रभावशाली जनहित सेवाएं उस तक पहुंचाने के लिए इसे शुरू किया था। उस दौरान संयुक्त राष्ट्र संघ (UN) ने भी इसकी तारीफ की थी। यूएन की ओर से कहा गया था कि आधार स्कीम भारत की बेहतरीन स्कीम है।

सामरिक मोर्चे पर भी कामयाबी-

यूपीए सरकार में अमेरिका के साथ न्यूक्लियर डील भी मनमोहन सिंह के बड़े कामों में शुमार है। इस डील की बदौलत भारत न्यूक्लियर हथियारों के मामले में एक पावरफुल नेशन बनकर उभरा। डील के तहत यह सहमति बनी थी कि भारत अपनी इकॉनमी की बेहतरी के लिए सिविलियन न्यूक्लियर एनर्जी पर काम करता रहेगा। आज भी पड़ोसी देशों से खतरे को देखते हुए यह डील अहम है।

मनमोहन सिंह(Dr. Manmohan Singh) जिन्हें नरसिम्हा राव ने खोजा था-

मनमोहन सिंह(Dr. Manmohan Singh) थे तो एक अर्थशास्त्री पर उन्हें राजनीति में लाने वाला कोई और ही था! मनमोहन सिंह को राजनीति में लाने का श्रेय भी एक पूर्व प्रधानमंत्री को जाता है। नरसिम्हा राव की सरकार में मनमोहन सिंह पहली बार भारत के वित्त मंत्री बने।

90 के दशक में जब पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या कर दी गई तो कॉंग्रेस के सामने देश के प्रधानमंत्री का नेतृत्व करने वाला शख़्स कौन होगा, ऐसा प्रश्न था।

राजीव गाँधी की हत्या के बाद सोनिया गाँधी ने इंदिरा गाँधी के पूर्व प्रधान सचिव पीएन हक्सर को 10, जनपथ तलब किया, उन्होंने हक्सर से पूछा कि आपकी नज़र में कांग्रेस की ओर से प्रधानमंत्री बनने की स्थिति में कौन सबसे उपयुक्त व्यक्ति हो सकता है? हक्सर ने तत्कालीन उप राष्ट्रपति शंकरदयाल शर्मा का नाम लिया।

एक डॉक्टर जिसने बच्चों की जान बचाने की कीमत 7 महीने “रासुका” में जेल काटकर चुकाई

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जानकारों की माने तो नटवर सिंह और अरुणा आसफ़ अली को ज़िम्मेदारी दी गई कि वो शंकरदयाल शर्मा का मन टटोलें। शर्मा ने इन दोनों की बात सुनी और कहा कि वो सोनिया की इस पेशकश से अभिभूत और सम्मानित महसूस कर रहे हैं लेकिन “भारत के प्रधानमंत्री का पद एक पूर्णकालिक ज़िम्मेदारी है। मेरी उम्र और मेरा स्वास्थ्य, मुझे देश के इस सबसे बड़े पद के प्रति न्याय नहीं करने देगा।”

इन दोनों ने वापस जाकर शंकरदयाल शर्मा का संदेश सोनिया गाँधी तक पहुंचाया। एक बार फिर सोनिया ने हक्सर को तलब किया। इस बार हक्सर ने नरसिम्हा राव का नाम लिया।

आगे की कहानी इतिहास है।

नरसिम्हा राव के राजनीतिक संघर्ष की कहानी बहुत लंबी है

किसी पद को पाने के लिए नरसिम्हा राव ने राजनीतिक पैराशूट का सहारा नहीं लिया था। राव का कांग्रेस और भारत के लिए सबसे बड़ा योगदान था डॉक्टर मनमोहन सिंह(Dr. Manmohan Singh) की खोज! नरसिम्हा राव भारतीय राजनीति के ऊबड़खाबड़ धरातल से ठोकरें खाते हुए सर्वोच्च पद पर पहुंचे थे।

पीसी अलेक्जेंडर ने नरसिम्हा राव को सुझाया था मनमोहन सिंह का नाम

जब नरसिम्हा राव 1991 में प्रधानमंत्री बने तो वो कई चीज़ों के विशेषज्ञ बन चुके थे। स्वास्थ्य और शिक्षा मंत्रालय वो पहले देख चुके थे। वो भारत के विदेश मंत्री भी रह चुके थे।

एक ही विभाग में उनका हाथ तंग था, वो था वित्त मंत्रालय। प्रधानमंत्री बनने से दो दिन पहले कैबिनेट सचिव नरेश चंद्रा ने उन्हें आठ पेज का एक नोट दिया था जिसमें बताया गया था कि भारत की आर्थिक स्थिति बहुत ख़राब है।

नरसिम्हा राव को एक चेहरा या मुखौटा चाहिए था जो अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और उनके घरेलू विरोधियों को संभाल सके। उन्होंने उस समय के अपने सबसे बड़े सलाहकार पीसी अलेक्ज़ेंडर से पूछा कि क्या आप वित्त मंत्री के लिए ऐसे शख़्स का नाम सुझा सकते हैं जिसकी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्यता हो। अलेक्ज़ेंडर ने उन्हें रिज़र्व बैंक के गवर्नर रह चुके और लंदन स्कूल ऑफ़ इकॉनॉमिक्स के निदेशक आईजी पटेल का नाम सुझाया।

आईजी पटेल दिल्ली आना नहीं चाहते थे क्योंकि उनकी माँ बीमार थीं और वो वड़ोदरा में रह रहे थे। फिर अलेक्ज़ेंडर ने ही मनमोहन सिंह का नाम लिया। अलेक्ज़ेंडर ने शपथ ग्रहण समारोह से एक दिन पहले मनमोहन सिंह को फ़ोन किया। उस समय वो सो रहे थे क्योंकि कुछ घंटे पहले ही विदेश से लौटे थे। जब उन्हें उठाकर इस प्रस्ताव के बारे में बताया गया तो उन्होंने इस पर विश्वास नहीं किया।

अगले दिन शपथ ग्रहण समारोह से तीन घंटे पहले मनमोहन सिंह के पास यूजीसी के दफ़्तर में नरसिम्हा राव का फ़ोन आया कि मैं आपको अपना वित्त मंत्री बनाना चाहता हूँ। शपथ ग्रहण समारोह से पहले नरसिम्हा राव ने मनमोहन सिंह से कहा कि अगर हम सफल होते हैं तो हम दोनों को इसका श्रेय मिलेगा लेकिन अगर हमारे हाथ असफलता लगती है तो आपको जाना पड़ेगा।

पहली ही बार में नाराज हो गए थे मनमोहन सिंह से नरसिम्हा राव

1991 के बजट से दो हफ़्ते पहले जब मनमोहन सिंह बजट का मसौदा लेकर नरसिम्हा राव के पास गए तो उन्होंने उसे सिरे से ख़ारिज कर दिया। उनके मुंह से निकला, “अगर मुझे यही चाहिए था तो मैंने आपको क्यों चुना?”

अपने पहले बजट में मनमोहन सिंह ने विक्टर ह्यूगो की उस मशहूर लाइन का ज़िक्र किया था कि “दुनिया की कोई ताकत उस विचार को नहीं रोक सकती, जिसका समय आ पहुंचा है। “

उन्होंने अपने बजट भाषण में राजीव गांधी, इंदिरा और नेहरू का बार-बार नाम ज़रूर लिया, लेकिन उनकी आर्थिक नीतियों को पलटने में वो ज़रा भी नहीं हिचके।

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आयुष तिवारी

वॉक्सी टॉक्सी के लेखक

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