जानिए कैसे एक ‘शून्य’ से जीवन ने बदल दी दलितों की जिंदगी , मान्यवर कांशीराम जी का संघर्ष भरा जीवन

मैं शून्य पे सवार हूँ , बेअदब सा मैं खुमार हूँ अब मुश्किलों से क्या डरूं , मैं खुद कहर हज़ार हूँ
ये पंक्तियाँ मान्यवर श्री कांशीराम साहब जी पर पूरी तरह आधारित हैं। अपने जीवन को भट्टी में झोंक कर अपने पूरे समाज को सर्वगुण सम्पन्न बनाने के लिए पूरा जीवन त्याग करने वाले ऐसे महापुरुष शायद ही हुए हैं। 1958 में स्नातक की डिग्री लेने के बाद पुणे स्थित डीआरडीओ में बतौर सहायक वैज्ञानिक काम किया। नौकरी के दौरान आंबेडकर जयंती पर अवकाश न होने के कारण वे बहुत आहत हुए और इसका विरोध भी किया। इस घटना के बाद उनका मन नौकरी से हट गया और कुछ समय बाद उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ दलितों व पिछडों के लिए काम करने की ठान ली।
नौकरी छोड़ने के पश्चात् उन्होंने घर छोड़ने का फैसला किया। घर के परिजनों के लिए एक पत्र छोड़ा जिसमे लिखा था ” मैं जा रहा हूँ और कभी वापस नहीं आऊंगा ” वास्तविकता में वे कभी घर नहीं गए। कभी विवाह का नहीं सोचा , न कोई सम्पति बनायीं , परिवार में अगर किसी की मृत्यु भी हो जाती तब भी वे नहीं जाते थे , जब कभी उनके घर से उनको कोई लेने अाता तो वे जाने से मना करा देते। वे सन्यासी तो नहीं पर सन्यासी से कम भी नहीं थे। संसार में ऐसे राजनीतिक व्यक्तित्व विरले ही हुए हैं जिन्होंने अपने संघर्ष से वंचितों को फ़र्श से अर्श तक पहुंचाया, लेकिन ख़ुद के लिए आरंभ से अंत तक ‘शून्य’ को प्रणाम करते रहे. कांशीराम ऐसी ही एक मिसाल हैं।
उनके बेहद ही खास मित्र डीके खरपडे के साथ मिल कर उन्होंने सरकारी दफ्तरों में अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति के लोगों के साथ मिल कर बैकवर्ड एंड माइनॉरिटी कम्युनिटीज एंप्लायीज फेडरेशन (बामसेफ़) की स्थापना की यह संगठन आज भी उसी जोश से काम करता है जिस जोश से मान्यवर कांशीराम साहब जी ने इसकी स्थापना की थी। 1981 में मान्यवर कांशीराम जी ने दलित शोषित समाज संघर्ष समिति की शुरुआत की जिसे (डीएस4) के नाम से जाना जाता है और 1984 में बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) का गठन किया। आगे चलकर उन्होंने मायावती को उत्तर प्रदेश की पहली दलित महिला मुख्यमंत्री बनाया। ऐसा देश के किसी भी सूबे में पहली बार हुआ था।
मान्यवर कांशीराम साहब जी के संघर्ष के दिन
सुश्री मायावती को बहुजन समाज पार्टी का उत्तराधिकारी घोषित किया –
इस महान शख्सियत ने अपने समाज को जागरूक करने के लिए सैकड़ो किलोमीटर साइकिल दौड़ाई , मीलों पैदल चले तब जा कर उन्होंने लाखों लोगो को अपने साथ इस अभियान में जोड़ा। एक समय ऐसा भी आया जब उन्होंने फटी कमीज़ पहन कर इस अभियान को दिशा दिखाई। वे हमेशा सफ़ेद व नीली कमीज़ ही पहना करते थे। उनकी समाज के लोगों से सिर्फ इतनी मांग थी की समाज के हर घर से मात्र 1 रुपया और 1 युवा व्यक्ति इनके साथ इनके मिशन के लिए आगे आए। वे इस बात को अच्छी तरह जानते थे कि युवा ही हमारे समाज का नेतृत्व कर सकता है इसलिए बहुजन समाज पार्टी की स्थापना के बाद एक युवा लड़की सुश्री मायावती जी को उन्होंने अपना उत्तराधिकारी के रूप में इस चुनावी मैदान में उतारने की घोषणा की।
1970-71 की बात है , मान्यवर कांशीराम जी को सर्दी के मौसम में कहीं संगठन के कार्य के लिए जाना था। तब वे नौकरी छोड़ चुके थे तथा समाज के संगठन में जुटे हुए थे। उस समय उनकी कोई पहचान भी नहीं बन पाई थी। ऐसे में पैसे की किल्लत होना लाजिमी था। सर्दी से बचने के लिए उन्होने एक कोट खरीदने की योजना बनाई। वे पुराने कपडों के बाजार में पहुँचे। पुराने कोट पर भी वे अधिक पैसे बर्बाद करने के पक्ष में नहीं थे। उन्होने दुकानदार से और सस्ता कोट दिखाने को कहा। दुकानदार ने व्यंग्य में कहा पास के मुर्दाघाट में चले जाओ वहाँ का डोम मुर्दो के कपडे बेचता है , इससे सस्ता तो वहीं मिल सकता है , कांशीराम जी बिना कुछ सोचे मुर्दाघाट में जा पहुँचे | वहाँ रखे मुर्दो के कोटो में से एक कोट उन्होने पाँच रूपये में खरीद लिया तथा उसे पहने और खुशी-खुशी अपने मिशन पर निकल गए।
अटल सरकार के वक्त अटल बिहारी वाजपेयी जी ने उनके सामने राष्ट्रपति बनने का प्रस्ताव रखा पर उन्होंने यह कहते हुए यह प्रस्ताव ठुकरा दिया की ”मैं राष्ट्रपति नहीं बल्कि प्रधानमंत्री बनना चाहता हूँ” कांशीराम राष्ट्रपति बन कर चुप-चाप बैठने वालो में से नहीं थे बल्कि प्रधानमंत्री की कुर्सी को दलित की दहलीज़ तक ला सकने की क्षमता रखते थे। सवाल ये है कि अटल बिहारी वाजपेयी कांशीराम को राष्ट्रपति क्यों बनाना चाहते थे ? कहते हैं कि राजनीति में प्रतिद्वंद्वी को प्रसन्न करना उसे कमज़ोर करने का एक प्रयास होता है ज़ाहिर है वाजपेयी इसमें कुशल होंगे ही. लेकिन जानकारों के मुताबिक वे कांशीराम को पूरी तरह समझने में थोड़ा चूक गए. वरना वे निश्चित ही उन्हें ऐसा प्रस्ताव नहीं देते.
मान्यवर कांशीराम पर किताब लिखने वाले एसएस गौतम बताते हैं, कि दलितों के साथ हुई किसी ज़्यादती को वे बर्दाश्त नहीं कर पाते थे- “एक बार कांशीराम रोपड़ के एक ढाबे में गए। वहां उन्होंने खाना खा रहे कुछ ज़मींदारों को शेख़ी बघारते हुए सुना कि किस तरह उन्होंने खेतों में काम कर रहे दलितों को सबक सिखाने के लिए उनकी पिटाई की है। यह सुनते ही मान्यवर कांशीराम का ख़ून खौल उठा और वो इतने आगबबूला हो गए कि उन्होंने एक कुर्सी उठाई और उससे ज़मीदारों को पीटने लगे। इस चक्कर में कई मेज़ें पलट गईं और उसपर रखी सभी प्लेटें चकनाचूर हो गईं। “
मान्यवर कांशीराम ने निम्नलिखित पत्रिकाएँ शुरू की : –
कांशीराम अनटचेबल इंडिया (अंग्रेजी) बामसेफ बुलेटिन (अंग्रेजी) आप्रेस्ड इंडियन (अंग्रेजी) बहुजन संगठनक (हिन्दी) बहुजन नायक (मराठी एवं बंग्ला) श्रमिक साहित्य शोषित साहित्य दलित आर्थिक उत्थान इकोनोमिक अपसर्ज (अंग्रेजी) बहुजन टाइम्स दैनिक बहुजन एकता
मान्यवर कांशीराम जी के द्वारा दिए गये कुछ नारे –
‘जिसकी जितनी संख्या भारी, उतनी उसकी हिस्सेदारी’
‘जो बहुजन की बात करेगा, वो दिल्ली पर राज करेगा’
‘निकलो बाहर मैदानों से जंग लड़ो बेईमानों से’ आदि।
नीचे दी गयी ऑडियो क्लिप में सुनें कुछ बेहतरीन बहुजन नारे।
90 का दशक आते-आते कांशीराम की तबियत ख़राब रहा करती थी। उनको शुगर ,ब्लड प्रेशर की काफ़ी समस्या रहती थी। उन्हें 1994 के शुरुआत में दिल का दौरा भी पड़ा , और 2003 में ब्रेन स्ट्रोक हो गया। सेहत के निरन्तर ख़राब रहने के कारण 9 अक्टूबर , 2006 को दिल का दौरा पड़ने से एक महान राजनीतिक, दलितों को गुलामी की जंजीरो से मुक्त होने का रास्ता दिखाने वाले मानवीय स्वरुप कहे जाने वाले इस दिग्गज का परिनिर्वाण हो गया।



